---
title: "बालकाण्ड दोहा 328"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-328"
lang: "hi"
---

# बालकाण्ड · दोहा 328

**चौ०** 
> पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती॥  
> परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा॥ १ ॥

भावार्थ: फिर बहुत प्रकारकी रसोई बनी। जनकजीने बरातियोंको बुला भेजा। राजा दशरथजीने पुत्रोंसहित गमन किया। अनुपम वस्त्रोंके पाँवड़े पड़ते जाते हैं॥ १॥

**चौ०** 
> सादर सब के पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे॥  
> धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना॥ २ ॥

भावार्थ: आदरके साथ सबके चरण धोये और सबको यथायोग्य पीढ़ोंपर बैठाया। तब जनकजीने अवधपति दशरथजीके चरण धोये। उनका शील और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता॥ २॥

**चौ०** 
> बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए॥  
> तीनिउ भाइ राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी॥ ३ ॥

भावार्थ: फिर श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंको धोया, जो श्रीशिवजीके हृदय-कमलमें छिपे रहते हैं। तीनों भाइयोंको श्रीरामचन्द्रजीके ही समान जानकर जनकजीने उनके भी चरण अपने हाथोंसे धोये॥ ३॥

**चौ०** 
> आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे॥  
> सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे॥ ४ ॥

भावार्थ: राजा जनकजीने सभीको उचित आसन दिये और सब परसनेवालोंको बुला लिया। आदरके साथ पत्तलें पड़ने लगीं, जो मणियोंके पत्तोंसे सोनेकी कील लगाकर बनायी गयी थीं॥ ४॥

**दो०** 
> सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत।  
> छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत॥ ३२८॥

भावार्थ: चतुर और विनीत रसोइये सुन्दर, स्वादिष्ट और पवित्र दाल-भात और गायका [ सुगन्धित ] घी क्षणभरमें सबके सामने परस गये॥ ३२८॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-327  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-329

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
