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title: "बालकाण्ड दोहा 324"
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# बालकाण्ड · दोहा 324

**चौ०** 
> जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी॥  
> सुजसु सुकृत सुख सुंदरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई॥१॥

भावार्थ: जनकजीकी जगद्विख्यात पटरानी और सीताजीकी माताका बखान तो हो ही कैसे सकता है। सुयश, सुकृत ( पुण्य ), सुख और सुन्दरता सबको बटोरकर विधाताने उन्हें सँवारकर तैयार किया है॥१॥

**चौ०** 
> समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाईं। सुनत सुआसिनि सादर ल्याईं॥  
> जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनी जनु मयना॥२॥

भावार्थ: समय जानकर श्रेष्ठ मुनियोंने उनको बुलवाया। यह सुनते ही सुहागिनी स्त्रियाँ उन्हें आदरपूर्वक ले आयीं। सुनयनाजी ( जनकजीकी पटरानी ) जनकजीकी बायीं ओर ऐसी सोह रही हैं, मानो हिमाचलके साथ मैनाजी शोभित हों॥२॥

**चौ०** 
> कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुगंध मंगल जल पूरे॥  
> निज कर मुदित रायँ अरु रानी। धरे राम के आगें आनी॥३॥

भावार्थ: पवित्र, सुगन्धित और मङ्गल जलसे भरे सोनेके कलश और मणियोंकी सुन्दर परातें राजा और रानीने आनन्दित होकर अपने हाथोंसे लाकर श्रीरामचन्द्रजीके आगे रखीं॥३॥

**चौ०** 
> पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी॥  
> बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे॥४॥

भावार्थ: मुनि मङ्गलवाणीसे वेद पढ़ रहे हैं। सुअवसर जानकर आकाशसे फूलोंकी झड़ी लग गयी है। दूलहको देखकर राजा-रानी प्रेममग्न हो गये और उनके पवित्र चरणोंको पखारने लगे॥४॥

**छं०** 
> लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली।  
> नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली॥  
> जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं।  
> जे सकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं॥ १ ॥

भावार्थ: वे श्रीरामजीके चरणकमलोंको पखारने लगे, प्रेमसे उनके शरीरमें पुलकावली छा रही है। आकाश और नगरमें होनेवाली गान, नगाड़े और जय-जयकारकी ध्वनि मानो चारों दिशाओंमें उमड़ चली। जो चरणकमल कामदेवके शत्रु श्रीशिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें सदा ही विराजते हैं, जिनका एक बार भी स्मरण करनेसे मनमें निर्मलता आ जाती है और कलियुगके सारे पाप भाग जाते हैं,॥१॥

**छं०** 
> जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई।  
> मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई॥  
> करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं।  
> ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहैं॥ २ ॥

भावार्थ: जिनका स्पर्श पाकर गौतम मुनिकी स्त्री अहल्याने, जो पापमयी थी, परमगति पायी, जिन चरणकमलोंका मकरन्दरस ( गङ्गाजी ) शिवजीके मस्तकपर विराजमान है, जिसको देवता पवित्रताकी सीमा बताते हैं; मुनि और योगीजन अपने मनको भौंरा बनाकर जिन चरणकमलोंका सेवन करके मनोवाञ्छित गति प्राप्त करते हैं; उन्हीं चरणोंको भाग्यके पात्र ( बड़भागी ) जनकजी धो रहे हैं; यह देखकर सब जय-जयकार कर रहे हैं॥२॥

**छं०** 
> बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं।  
> भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनँद भरैं॥  
> सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो।  
> करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो॥ ३ ॥

भावार्थ: दोनों कुलोंके गुरु वर और कन्याकी हथेलियोंको मिलाकर शाखोच्चार करने लगे। पाणिग्रहण हुआ देखकर ब्रह्मादि देवता, मनुष्य और मुनि आनन्दमें भर गये। सुखके मूल दूलहको देखकर राजा-रानीका शरीर पुलकित हो गया और हृदय आनन्दसे उमँग उठा। राजाओंके अलङ्कारस्वरूप महाराज जनकजीने लोक और वेदकी रीतिको करके कन्यादान किया॥३॥

**छं०** 
> हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई।  
> तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥  
> क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं।  
> करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं॥ ४ ॥

भावार्थ: जैसे हिमवान्‌ने शिवजीको पार्वतीजी और सागरने भगवान् विष्णुको लक्ष्मीजी दी थीं, वैसे ही जनकजीने श्रीरामचन्द्रजीको सीताजी समर्पित कीं, जिससे विश्वमें सुन्दर नवीन कीर्ति छा गयी। विदेह ( जनकजी ) कैसे विनती करें! उस साँवली मूर्तिने तो उन्हें सचमुच विदेह ( देहकी सुध-बुधसे रहित ) ही कर दिया। विधिपूर्वक हवन करके गठजोड़ी की गयी और भाँवरें होने लगीं॥४॥

**दो०** 
> जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान।  
> सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरतरु सुमन सुजान॥ ३२४ ॥

भावार्थ: जयध्वनि, वन्दीध्वनि, वेदध्वनि, मङ्गलगान और नगाड़ोंकी ध्वनि सुनकर चतुर देवगण हर्षित हो रहे हैं और कल्पवृक्षके फूलोंको बरसा रहे हैं॥३२४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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