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title: "बालकाण्ड दोहा 322"
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# बालकाण्ड · दोहा 322

श्रीसीता-राम-विवाह

**चौ०** 
> समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए॥  
> बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई॥१॥

भावार्थ: समय देखकर वसिष्ठजीने शतानन्दजीको आदरपूर्वक बुलाया। वे सुनकर आदरके साथ आये। वसिष्ठजीने कहा—अब जाकर राजकुमारीको शीघ्र ले आइये। मुनिकी आज्ञा पाकर वे प्रसन्न होकर चले॥ १ ॥

**चौ०** 
> रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी॥  
> बिप्र बधू कुल बृद्ध बोलाईं। करि कुलरीति सुमंगल गाईं॥२॥

भावार्थ: बुद्धिमती रानी पुरोहितकी वाणी सुनकर सखियोंसमेत बड़ी प्रसन्न हुईं। ब्राह्मणोंकी स्त्रियों और कुलकी बूढ़ी स्त्रियोंको बुलाकर उन्होंने कुलरीति करके सुन्दर मङ्गलगीत गाये॥ २ ॥

**चौ०** 
> नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा॥  
> तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं॥३॥

भावार्थ: श्रेष्ठ देवाङ्गनाएँ, जो सुन्दर मनुष्य-स्त्रियोंके वेषमें हैं, सभी स्वभावसे ही सुन्दरी और श्यामा ( सोलह वर्षकी अवस्थावाली ) हैं। उनको देखकर रनिवासकी स्त्रियाँ सुख पाती हैं और बिना पहचानके ही वे सबको प्राणोंसे भी प्यारी हो रही हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी॥  
> सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई॥४॥

भावार्थ: उन्हें पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वतीके समान जानकर रानी बार-बार उनका सम्मान करती हैं। [ रनिवासकी स्त्रियाँ और सखियाँ ] सीताजीका शृंगार करके, मण्डली बनाकर, प्रसन्न होकर उन्हें मण्डपमें लिवा चलीं॥ ४॥

**छं०** 
> चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं।  
> नवसप्त साजे सुंदरीं सब मत्त कुंजर गामिनीं॥  
> कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं।  
> मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥

भावार्थ: सुन्दर मङ्गलका साज सजकर [ रनिवासकी ] स्त्रियाँ और सखियाँ आदरसहित सीताजीको लिवा चलीं। सभी सुन्दरियाँ सोलहों शृंगार किये हुए मतवाले हाथियोंकी चालसे चलनेवाली हैं। उनके मनोहर गानको सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेवकी कोयलें भी लजा जाती हैं। पायजेब, पैंजनी और सुन्दर कंकण तालकी गतिपर बड़े सुन्दर बज रहे हैं।

**दो०** 
> सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय।  
> छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय॥३२२॥

भावार्थ: सहज ही सुन्दरी सीताजी स्त्रियोंके समूहमें इस प्रकार शोभा पा रही हैं, मानो छबिरूपी ललनाओंके समूहके बीच साक्षात् परम मनोहर शोभारूपी स्त्री सुशोभित हो॥ ३२२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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