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title: "बालकाण्ड दोहा 316"
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# बालकाण्ड · दोहा 316

**चौ०** 
> केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥  
> ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए॥१॥

भावार्थ: रामजीका मोरके कण्ठकी-सी कान्तिवाला [ हरिताभ ] श्याम शरीर है। बिजलीका अत्यन्त निरादर करनेवाले प्रकाशमय सुन्दर [ पीत ] रंगके वस्त्र हैं। सब मङ्गलरूप और सब प्रकारसे सुन्दर भाँति-भाँतिके विवाहके आभूषण शरीरपर सजाये हुए हैं॥१॥

**चौ०** 
> सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन॥  
> सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन भाई॥२॥

भावार्थ: उनका सुन्दर मुख शरत्पूर्णिमाके निर्मल चन्द्रमाके समान और [ मनोहर ] नेत्र नवीन कमलको लजानेवाले हैं। सारी सुन्दरता अलौकिक है। ( मायाकी बनी नहीं है, दिव्य सच्चिदानन्दमयी है ) वह कही नहीं जा सकती, मन-ही-मन बहुत प्रिय लगती है॥२॥

**चौ०** 
> बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा॥  
> राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं॥३॥

भावार्थ: साथमें मनोहर भाई शोभित हैं, जो चञ्चल घोड़ोंको नचाते हुए चले जा रहे हैं। राजकुमार श्रेष्ठ घोड़ोंको ( उनकी चालको ) दिखला रहे हैं और वंशकी प्रशंसा करनेवाले ( मागध-भाट ) विरुदावली सुना रहे हैं॥३॥

**चौ०** 
> जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे॥  
> कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा॥४॥

भावार्थ: जिस घोड़ेपर श्रीरामजी विराजमान हैं, उसकी [ तेज ] चाल देखकर गरुड़ भी लजा जाते हैं। उसका वर्णन नहीं हो सकता, वह सब प्रकारसे सुन्दर है। मानो कामदेवने ही घोड़ेका वेष धारण कर लिया हो॥४॥

**छं०** 
> जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई।  
> आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई॥  
> जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे।  
> किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे॥

भावार्थ: मानो श्रीरामचन्द्रजीके लिये कामदेव घोड़ेका वेष बनाकर अत्यन्त शोभित हो रहा है। वह अपनी अवस्था, बल, रूप, गुण और चालसे समस्त लोकोंको मोहित कर रहा है। सुन्दर मोती, मणि और माणिक्य लगी हुई जड़ाऊ जीन ज्योतिसे जगमगा रहा है। उसकी सुन्दर घुँघरू लगी ललित लगामको देखकर देवता, मनुष्य और मुनि सभी ठगे जाते हैं।

**दो०** 
> प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।  
> भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव॥ ३१६ ॥

भावार्थ: प्रभुकी इच्छामें अपने मनको लीन किये चलता हुआ वह घोड़ा बड़ी शोभा पा रहा है। मानो तारागण तथा बिजलीसे अलङ्कृत मेघ सुन्दर मोरको नचा रहा हो॥३१६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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