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title: "बालकाण्ड दोहा 315"
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# बालकाण्ड · दोहा 315

**चौ०** 
> जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं॥  
> करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी॥१॥

भावार्थ: जिनका नाम लेते ही जगत्‌में सारे अमङ्गलोंकी जड़ कट जाती है और चारों पदार्थ ( अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष ) मुट्‌ठीमें आ जाते हैं, ये वही [ जगत्‌के माता-पिता ] श्रीसीतारामजी हैं; कामके शत्रु शिवजीने ऐसा कहा॥१॥

**चौ०** 
> एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा॥  
> देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता॥२॥

भावार्थ: इस प्रकार शिवजीने देवताओंको समझाया और फिर अपने श्रेष्ठ बैल नन्दीश्वरको आगे बढ़ाया। देवताओंने देखा कि दशरथजी मनमें बड़े ही प्रसन्न और शरीरसे पुलकित हुए चले जा रहे हैं॥२॥

**चौ०** 
> साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा॥  
> सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी॥३॥

भावार्थ: उनके साथ [ परम हर्षयुक्त ] साधुओं और ब्राह्मणोंकी मण्डली ऐसी शोभा दे रही है, मानो समस्त सुख शरीर धारण करके उनकी सेवा कर रहे हों। चारों सुन्दर पुत्र साथमें ऐसे सुशोभित हैं, मानो सम्पूर्ण मोक्ष ( सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य ) शरीर धारण किये हुए हों॥३॥

**चौ०** 
> मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी॥  
> पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे॥४॥

भावार्थ: मरकतमणि और सुवर्णके रंगकी सुन्दर जोड़ियोंको देखकर देवताओंको कम प्रीति नहीं हुई ( अर्थात्‌ बहुत ही प्रीति हुई )। फिर श्रीरामचन्द्रजीको देखकर वे हृदयमें ( अत्यन्त ) हर्षित हुए और राजाकी सराहना करके उन्होंने फूल बरसाये॥४॥

**दो०** 
> राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।  
> पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि॥३१५॥

भावार्थ: नखसे शिखातक श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर रूपको बार-बार देखते हुए पार्वतीजीसहित श्रीशिवजीका शरीर पुलकित हो गया और उनके नेत्र [ प्रेमाश्रुओंके ] जलसे भर गये॥३१५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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