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title: "बालकाण्ड दोहा 313"
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# बालकाण्ड · दोहा 313

**चौ०** 
> उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा॥  
> सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए॥१॥

भावार्थ: तब राजा जनकने पुरोहित शतानन्दजीसे कहा कि अब देरका क्या कारण है। तब शतानन्दजीने मन्त्रियोंको बुलाया। वे सब मङ्गलका सामान सजाकर ले आये॥१॥

**चौ०** 
> संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे॥  
> सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता॥२॥

भावार्थ: शङ्ख, नगाड़े, ढोल और बहुत-से बाजे बजने लगे तथा मङ्गल-कलश और शुभ शकुनकी वस्तुएँ ( दधि, दूर्वा आदि ) सजायी गयीं। सुन्दर सुहागिन स्त्रियाँ गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेदकी ध्वनि कर रहे हैं॥२॥

**चौ०** 
> लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती॥  
> कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू॥३॥

भावार्थ: सब लोग इस प्रकार आदरपूर्वक बारातको लेने चले और जहाँ बरातियोंका जनवासा था, वहाँ गये। अवधपति दशरथजीका समाज ( वैभव ) देखकर उनको देवराज इन्द्र भी बहुत ही तुच्छ लगने लगे॥३॥

**चौ०** 
> भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ॥  
> गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा॥४॥

भावार्थ: [ उन्होंने जाकर विनती की— ] समय हो गया, अब पधारिये। यह सुनते ही नगाड़ोंपर चोट पड़ी। गुरु वसिष्ठजीसे पूछकर और कुलकी सब रीतियोंको करके राजा दशरथजी मुनियों और साधुओंके समाजको साथ लेकर चले॥४॥

**दो०** 
> भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।  
> लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि॥३१३॥

भावार्थ: अवधनरेश दशरथजीका भाग्य और वैभव देखकर और अपना जन्म व्यर्थ समझकर, ब्रह्माजी आदि देवता हजारों मुखोंसे उसकी सराहना करने लगे॥३१३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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