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title: "बालकाण्ड दोहा 312"
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# बालकाण्ड · दोहा 312

**चौ०** 
> एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं॥  
> जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए॥ १॥

भावार्थ: इस प्रकार सब मनोरथ कर रही हैं और हृदयको उमँग-उमँगकर ( उत्साहपूर्वक ) आनन्दसे भर रही हैं। सीताजीके स्वयंवरमें जो राजा आये थे, उन्होंने भी चारों भाइयोंको देखकर सुख पाया॥१॥

**चौ०** 
> कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला॥  
> गए बीति कछु दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती॥२॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीका निर्मल और महान्‌ यश कहते हुए राजा लोग अपने-अपने घर गये। इस प्रकार कुछ दिन बीत गये। जनकपुरनिवासी और बराती सभी बड़े आनन्दित हैं॥२॥

**चौ०** 
> मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥  
> ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू॥३॥

भावार्थ: मङ्गलोंका मूल लग्नका दिन आ गया। हेमन्त-ऋतु और सुहावना अगहनका महीना था। ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और वार श्रेष्ठ थे। लग्न ( मुहूर्त ) शोधकर ब्रह्माजीने उसपर विचार किया,॥३॥

**चौ०** 
> पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई॥  
> सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता॥४॥

भावार्थ: और उस ( लग्नपत्रिका ) को नारदजीके हाथ [ जनकजीके यहाँ ] भेज दिया। जनकजीके ज्योतिषियोंने भी वही गणना कर रखी थी। जब सब लोगोंने यह बात सुनी तब वे कहने लगे—यहाँके ज्योतिषी भी ब्रह्मा ही हैं॥४॥

**दो०** 
> धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।  
> बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल॥३१२॥

भावार्थ: निर्मल और सभी सुन्दर मङ्गलोंकी मूल गोधूलिकी पवित्र वेला आ गयी और अनुकूल शकुन होने लगे, यह जानकर ब्राह्मणोंने जनकजीसे कहा॥३१२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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