---
title: "बालकाण्ड दोहा 31"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-31"
lang: "hi"
---

# बालकाण्ड · दोहा 31

**चौ०** 
> तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥  
> भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई॥१॥

भावार्थ: तो भी गुरुजीने जब बार-बार कथा कही, तब बुद्धिके अनुसार कुछ समझमें आयी। वही अब मेरे द्वारा भाषामें रची जायगी, जिससे मेरे मनको सन्तोष हो॥१॥

**चौ०** 
> जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें॥  
> निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी॥२॥

भावार्थ: जैसा कुछ मुझमें बुद्धि और विवेकका बल है, मैं हृदयमें हरिकी प्रेरणासे उसीके अनुसार कहूँगा। मैं अपने सन्देह, अज्ञान और भ्रमको हरनेवाली कथा रचता हूँ, जो संसाररूपी नदीके पार करनेके लिये नाव है॥२॥

**चौ०** 
> बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि॥  
> रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी॥३॥

भावार्थ: रामकथा पण्डितोंको विश्राम देनेवाली, सब मनुष्योंको प्रसन्न करनेवाली और कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली है। रामकथा कलियुगरूपी साँपके लिये मोरनी है और विवेकरूपी अग्निके प्रकट करनेके लिये अरणि (मन्थन की जानेवाली लकड़ी) है, (अर्थात्‌ इस कथासे ज्ञानकी प्राप्ति होती है)॥३॥

**चौ०** 
> रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई॥  
> सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि॥४॥

भावार्थ: रामकथा कलियुगमें सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली कामधेनु गौ है और सज्जनोंके लिये सुन्दर सञ्जीवनी जड़ी है। पृथ्वीपर यही अमृतकी नदी है, जन्म-मरणरूपी भयका नाश करनेवाली और भ्रमरूपी मेढकोंको खानेके लिये सर्पिणी है॥४॥

**चौ०** 
> असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि॥  
> संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी॥५॥

भावार्थ: यह रामकथा असुरोंकी सेनाके समान नरकोंका नाश करनेवाली और साधुरूप देवताओंके कुलका हित करनेवाली पार्वती (दुर्गा) है। यह संत-समाजरूपी क्षीरसमुद्रके लिये लक्ष्मीजीके समान है और सम्पूर्ण विश्वका भार उठानेमें अचल पृथ्वीके समान है॥५॥

**चौ०** 
> जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी॥  
> रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी॥६॥

भावार्थ: यमदूतोंके मुखपर कालिख लगानेके लिये यह जगत्‌में यमुनाजीके समान है और जीवोंको मुक्ति देनेके लिये मानो काशी ही है। यह श्रीरामजीको पवित्र तुलसीके समान प्रिय है और तुलसीदासके लिये हुलसी (तुलसीदासजीकी माता) के समान हृदयसे हित करनेवाली है॥६॥

**चौ०** 
> सिवप्रिय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी॥  
> सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी॥७॥

भावार्थ: यह रामकथा शिवजीको नर्मदाजीके समान प्यारी है, यह सब सिद्धियोंकी तथा सुख-सम्पत्तिकी राशि है। सद्‌गुणरूपी देवताओंके उत्पन्न और पालन-पोषण करनेके लिये माता अदितिके समान है। श्रीरघुनाथजीकी भक्ति और प्रेमकी परम सीमा-सी है॥७॥

**दो०** 
> रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।  
> तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु॥३१॥

भावार्थ: तुलसीदासजी कहते हैं कि रामकथा मन्दाकिनी नदी है, सुन्दर (निर्मल) चित्त चित्रकूट है, और सुन्दर स्नेह ही वन है, जिसमें श्रीसीतारामजी विहार करते हैं॥३१॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-30b  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-32b

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
