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title: "बालकाण्ड दोहा 308"
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# बालकाण्ड · दोहा 308

**चौ०** 
> मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा॥  
> कौसिक राउ लिए उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई॥१॥

भावार्थ: पृथ्वीपति दशरथजीने मुनिकी चरणधूलिको बारंबार सिरपर चढ़ाकर उनको दण्डवत्‌ प्रणाम किया। विश्वामित्रजीने राजाको उठाकर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद देकर कुशल पूछी॥ १ ॥

**चौ०** 
> पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई॥  
> सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे॥२॥

भावार्थ: फिर दोनों भाइयोंको दण्डवत्‌ प्रणाम करते देखकर राजाके हृदयमें सुख समाया नहीं। पुत्रोंको [ उठाकर ] हृदयसे लगाकर उन्होंने अपने [ वियोगजनित ] दुःसह दुःखको मिटाया। मानो मृतक शरीरको प्राण मिल गये हों॥ २ ॥

**चौ०** 
> पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए॥  
> बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मनभावती असीसें पाईं॥३॥

भावार्थ: फिर उन्होंने वसिष्ठजीके चरणोंमें सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठने प्रेमके आनन्दमें उन्हें हृदयसे लगा लिया। दोनों भाइयोंने सब ब्राह्मणोंकी वन्दना की और मनभाये आशीर्वाद पाये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा॥  
> हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता॥४॥

भावार्थ: भरतजीने छोटे भाई शत्रुघ्नसहित श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया। श्रीरामजीने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया। लक्ष्मणजी दोनों भाइयोंको देखकर हर्षित हुए और प्रेमसे परिपूर्ण हुए शरीरसे उनसे मिले॥ ४ ॥

**दो०** 
> पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।  
> मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत॥३०८॥

भावार्थ: तदनन्तर परम कृपालु और विनयी श्रीरामचन्द्रजी अयोध्यावासियों, कुटुम्बियों, जातिके लोगों, याचकों, मन्त्रियों और मित्रों—सभीसे यथायोग्य मिले॥ ३०८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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