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title: "बालकाण्ड दोहा 307"
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# बालकाण्ड · दोहा 307

**चौ०** 
> निज निज बास बिलोकि बराती। सुरसुख सकल सुलभ सब भाँती॥  
> बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना॥१॥

भावार्थ: बरातियोंने अपने-अपने ठहरनेके स्थान देखे तो वहाँ देवताओंके सब सुखोंको सब प्रकारसे सुलभ पाया। इस ऐश्वर्यका कुछ भी भेद कोई जान न सका। सब जनकजीकी बड़ाई कर रहे हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी॥  
> पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई॥२॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजी यह सब सीताजीकी महिमा जानकर और उनका प्रेम पहचानकर हृदयमें हर्षित हुए। पिता दशरथजीके आनेका समाचार सुनकर दोनों भाइयोंके हृदयमें महान्‌ आनन्द समाता न था॥ २ ॥

**चौ०** 
> सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं॥  
> बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी॥३॥

भावार्थ: संकोचवश वे गुरु विश्वामित्रजीसे कह नहीं सकते थे; परन्तु मनमें पिताजीके दर्शनोंकी लालसा थी। विश्वामित्रजीने उनकी बड़ी नम्रता देखी, तो उनके हृदयमें बहुत सन्तोष उत्पन्न हुआ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए॥  
> चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे॥४॥

भावार्थ: प्रसन्न होकर उन्होंने दोनों भाइयोंको हृदयसे लगा लिया। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें ( प्रेमाश्रुओंका ) जल भर आया। वे उस जनवासेको चले, जहाँ दशरथजी थे। मानो सरोवर प्यासेकी ओर लक्ष्य करके चला हो॥ ४ ॥

**दो०** 
> भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।  
> उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत॥३०७॥

भावार्थ: जब राजा दशरथजीने पुत्रोंसहित मुनिको आते देखा, तब वे हर्षित होकर उठे और सुखके समुद्रमें थाह-सी लेते हुए चले॥ ३०७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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