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title: "बालकाण्ड दोहा 306"
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# बालकाण्ड · दोहा 306

**चौ०** 
> बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं॥  
> बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें॥१॥

भावार्थ: देवसुन्दरियाँ फूल बरसाकर गीत गा रही हैं, और देवता आनन्दित होकर नगाड़े बजा रहे हैं। [ अगवानीमें आये हुए ] उन लोगोंने सब चीजें दशरथजीके आगे रख दीं और अत्यन्त प्रेमसे विनती की॥ १ ॥

**चौ०** 
> प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा॥  
> करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई॥२॥

भावार्थ: राजा दशरथजीने प्रेमसहित सब वस्तुएँ ले लीं, फिर उनकी बख्शीशें होने लगीं और वे याचकोंको दे दी गयीं। तदनन्तर पूजा, आदर-सत्कार और बड़ाई करके अगवान लोग उनको जनवासेकी ओर लिवा ले चले॥ २ ॥

**चौ०** 
> बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनदु धन मदु परिहरहीं॥  
> अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा॥३॥

भावार्थ: विलक्षण वस्त्रोंके पाँवड़े पड़ रहे हैं, जिन्हें देखकर कुबेर भी अपने धनका अभिमान छोड़ देते हैं। बड़ा सुन्दर जनवासा दिया गया, जहाँ सबको सब प्रकारका सुभीता था॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई॥  
> हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाईं। भूप पहुनई करन पठाईं॥४॥

भावार्थ: सीताजीने बारात जनकपुरमें आयी जानकर अपनी कुछ महिमा प्रकट करके दिखलायी। हृदयमें स्मरणकर सब सिद्धियोंको बुलाया और उन्हें राजा दशरथजीकी मेहमानी करनेके लिये भेजा॥ ४ ॥

**दो०** 
> सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।  
> लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास॥३०६॥

भावार्थ: सीताजीकी आज्ञा सुनकर सब सिद्धियाँ जहाँ जनवासा था वहाँ सारी सम्पदा, सुख और इन्द्रपुरीके भोग-विलासको लिये हुए गयीं॥ ३०६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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