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title: "बालकाण्ड दोहा 305"
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# बालकाण्ड · दोहा 305

**चौ०** 
> कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥  
> भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने॥१॥

भावार्थ: [ दूध, शर्बत, ठंढाई, जल आदिसे ] भरकर सोनेके कलश तथा जिनका वर्णन नहीं हो सकता ऐसे अमृतके समान भाँति-भाँतिके सब पकवानोंसे भरे हुए परात, थाल आदि अनेक प्रकारके सुन्दर बर्तन,॥ १ ॥

**चौ०** 
> फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं॥  
> भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहु बिधि जाना॥२॥

भावार्थ: उत्तम फल तथा और भी अनेकों सुन्दर वस्तुएँ राजाने हर्षित होकर भेंटके लिये भेजीं। गहने, कपड़े, नाना प्रकारकी मूल्यवान्‌ मणियाँ ( रत्न ), पक्षी, पशु, घोड़े, हाथी और बहुत तरहकी सवारियाँ,॥ २ ॥

**चौ०** 
> मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए॥  
> दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा॥३॥

भावार्थ: तथा बहुत प्रकारके सुगन्धित एवं सुहावने मङ्गल-द्रव्य और सगुनके पदार्थ राजाने भेजे। दही, चिउड़ा और अगणित उपहारकी चीजें काँवरोंमें भर-भरकर कहार चले॥ ३ ॥

**चौ०** 
> अगवानन्ह जब दीखि बराता। उर आनंदु पुलक भर गाता॥  
> देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना॥४॥

भावार्थ: अगवानी करनेवालोंको जब बारात दिखायी दी, तब उनके हृदयमें आनन्द छा गया और शरीर रोमाञ्चसे भर गया। अगवानोंको सज-धजके साथ देखकर बरातियोंने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाये॥ ४ ॥

**दो०** 
> हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।  
> जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल॥३०५॥

भावार्थ: [ बराती तथा अगवानोंमेंसे ] कुछ लोग परस्पर मिलनेके लिये हर्षके मारे बाग छोड़कर ( सरपट ) दौड़ चले, और ऐसे मिले मानो आनन्दके दो समुद्र मर्यादा छोड़कर मिलते हों॥ ३०५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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