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title: "बालकाण्ड दोहा 304"
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# बालकाण्ड · दोहा 304

**चौ०** 
> मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें॥  
> राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता॥१॥

भावार्थ: स्वयं सगुण ब्रह्म जिसके सुन्दर पुत्र हैं, उसके लिये सब मङ्गल शकुन सुलभ हैं। जहाँ श्रीरामचन्द्रजी-सरीखे दूल्हा और सीताजी-जैसी दुलहिन हैं तथा दशरथजी और जनकजी-जैसे पवित्र समधी हैं,॥ १ ॥

**चौ०** 
> सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे॥  
> एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना॥२॥

भावार्थ: ऐसा ब्याह सुनकर मानो सभी शकुन नाच उठे [ और कहने लगे— ] अब ब्रह्माजीने हमको सच्चा कर दिया। इस तरह बारातने प्रस्थान किया। घोड़े, हाथी गरज रहे हैं और नगाड़ोंपर चोट लग रही है॥ २ ॥

**चौ०** 
> आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू॥  
> बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए॥३॥

भावार्थ: सूर्यवंशके पताकास्वरूप दशरथजीको आते हुए जानकर जनकजीने नदियोंपर पुल बँधवा दिये। बीच-बीचमें ठहरनेके लिये सुन्दर घर ( पड़ाव ) बनवा दिये, जिनमें देवलोकके समान सम्पदा छायी है,॥ ३ ॥

**चौ०** 
> असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए॥  
> नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले॥४॥

भावार्थ: और जहाँ बारातके सब लोग अपने-अपने मनकी पसंदके अनुसार सुहावने उत्तम भोजन, बिस्तर और वस्त्र पाते हैं। मनके अनुकूल नित्य नये सुखोंको देखकर सभी बरातियोंको अपने घर भूल गये॥ ४ ॥

**दो०** 
> आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान।  
> सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान॥३०४॥

भावार्थ: बड़े जोरसे बजते हुए नगाड़ोंकी आवाज सुनकर श्रेष्ठ बारातको आती हुई जानकर अगवानी करनेवाले हाथी, रथ, पैदल और घोड़े सजाकर बारात लेने चले॥ ३०४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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