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title: "बालकाण्ड दोहा 298"
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# बालकाण्ड · दोहा 298

**चौ०** 
> भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई॥  
> चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता॥१॥

भावार्थ: फिर राजाने भरतजीको बुला लिया और कहा कि जाकर घोड़े, हाथी और रथ सजाओ, जल्दी रामचन्द्रजीकी बारातमें चलो। यह सुनते ही दोनों भाई ( भरतजी और शत्रुघ्नजी ) आनन्दवश पुलकसे भर गये॥१॥

**चौ०** 
> भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए॥  
> रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे॥२॥

भावार्थ: भरतजीने सब साहनी ( घुड़सालके अध्यक्ष ) बुलाये और उन्हें [ घोड़ोंको सजानेकी ] आज्ञा दी, वे प्रसन्न होकर उठ दौड़े। उन्होंने रुचिके साथ ( यथायोग्य ) जीनें कसकर घोड़े सजाये। रंग-रंगके उत्तम घोड़े शोभित हो गये॥२॥

**चौ०** 
> सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी॥  
> नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने॥३॥

भावार्थ: सब घोड़े बड़े ही सुन्दर और चञ्चल करनी ( चाल ) के हैं। वे धरतीपर ऐसे पैर रखते हैं जैसे जलते हुए लोहेपर रखते हों। अनेकों जातिके घोड़े हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता। [ ऐसी तेज चालके हैं ] मानो हवाका निरादर करके उड़ना चाहते हैं॥३॥

**चौ०** 
> तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा॥  
> सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी॥४॥

भावार्थ: उन सब घोड़ोंपर भरतजीके समान अवस्थावाले सब छैल-छबीले राजकुमार सवार हुए। वे सभी सुन्दर हैं और सब आभूषण धारण किये हुए हैं। उनके हाथोंमें बाण और धनुष हैं तथा कमरमें भारी तरकस बँधे हैं॥४॥

**दो०** 
> छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन।  
> जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन॥२९८॥

भावार्थ: सभी चुने हुए छबीले छैल, शूरवीर, चतुर और नवयुवक हैं। प्रत्येक सवारके साथ दो पैदल सिपाही हैं, जो तलवार चलानेकी कलामें बड़े निपुण हैं॥२९८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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