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title: "बालकाण्ड दोहा 297"
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# बालकाण्ड · दोहा 297

**चौ०** 
> जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नवसप्त सकल दुति दामिनि॥  
> बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरूप रति मानु बिमोचनि॥१॥

भावार्थ: बिजलीकी-सी कान्तिवाली चन्द्रमुखी, हरिनके बच्चेके-से नेत्रोंवाली और अपने सुन्दररूपसे कामदेवकी स्त्री रतिके अभिमानको छुड़ानेवाली सुहागिनी स्त्रियाँ सभी सोलहों शृंगार सजकर, जहाँ-तहाँ झुंड-की-झुंड मिलकर, ॥१॥

**चौ०** 
> गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनि कलरव कलकंठि लजानीं॥  
> भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना॥२॥

भावार्थ: मनोहर वाणीसे मङ्गलगीत गा रही हैं, जिनके सुन्दर स्वरको सुनकर कोयलें भी लजा जाती हैं। राजमहलका वर्णन कैसे किया जाय, जहाँ विश्वको विमोहित करनेवाला मण्डप बनाया गया है॥२॥

**चौ०** 
> मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना॥  
> कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं॥३॥

भावार्थ: अनेकों प्रकारके मनोहर माङ्गलिक पदार्थ शोभित हो रहे हैं और बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं। कहीं भाट विरुदावली ( कुलकीर्ति ) का उच्चारण कर रहे हैं और कहीं ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं॥३॥

**चौ०** 
> गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अरु सीता॥  
> बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा॥४॥

भावार्थ: सुन्दरी स्त्रियाँ श्रीरामजी और श्रीसीताजीका नाम ले-लेकर मङ्गलगीत गा रही हैं। उत्साह बहुत है और महल अत्यन्त ही छोटा है। इससे [ उसमें न समाकर ] मानो वह उत्साह ( आनन्द ) चारों ओर उमड़ चला है॥४॥

**दो०** 
> सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार।  
> जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार॥२९७॥

भावार्थ: दशरथके महलकी शोभाका वर्णन कौन कवि कर सकता है, जहाँ समस्त देवताओंके शिरोमणि रामचन्द्रजीने अवतार लिया है॥२९७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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