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title: "बालकाण्ड दोहा 292"
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# बालकाण्ड · दोहा 292

**चौ०** 
> पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे॥  
> जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे॥१॥

भावार्थ: आपके पुत्र पूछने योग्य नहीं हैं। वे पुरुषसिंह तीनों लोकोंके प्रकाशस्वरूप हैं। जिनके यशके आगे चन्द्रमा मलिन और प्रतापके आगे सूर्य शीतल लगता है, ॥१॥

**चौ०** 
> तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे॥  
> सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका॥२॥

भावार्थ: हे नाथ! उनके लिये आप कहते हैं कि उन्हें कैसे पहचाना! क्या सूर्यको हाथमें दीपक लेकर देखा जाता है? सीताजीके स्वयंवरमें अनेकों राजा और एक-से-एक बढ़कर योद्धा एकत्र हुए थे, ॥२॥

**चौ०** 
> संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल बीर बरिआरा॥  
> तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी॥३॥

भावार्थ: परन्तु शिवजीके धनुषको कोई भी नहीं हटा सका। सारे बलवान्‌ वीर हार गये। तीनों लोकोंमें जो वीरताके अभिमानी थे, शिवजीके धनुषने सबकी शक्ति तोड़ दी॥३॥

**चौ०** 
> सकइ उठाइ सरासुर मेरू। सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू॥  
> जेहिं कौतुक सिवसैलु उठावा। सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा॥४॥

भावार्थ: बाणासुर, जो सुमेरुको भी उठा सकता था, वह भी हृदयमें हारकर परिक्रमा करके चला गया; और जिसने खेलसे ही कैलासको उठा लिया था, वह रावण भी उस सभामें पराजयको प्राप्त हुआ॥४॥

**दो०** 
> तहाँ राम रघुबंसमनि सुनिअ महा महिपाल।  
> भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल॥२९२॥

भावार्थ: हे महाराज! सुनिये, वहाँ ( जहाँ ऐसे-ऐसे योद्धा हार मान गये ) रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीने बिना ही प्रयास शिवजीके धनुषको वैसे ही तोड़ डाला जैसे हाथी कमलकी डंडीको तोड़ डालता है!॥२९२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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