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title: "बालकाण्ड दोहा 289"
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# बालकाण्ड · दोहा 289

**चौ०** 
> रचे रुचिर बर बंदनिवारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे॥  
> मंगल कलस अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए॥१॥

भावार्थ: ऐसे सुन्दर और उत्तम बंदनवार बनाये मानो कामदेवने फंदे सजाये हों। अनेकों मङ्गल-कलश और सुन्दर ध्वजा, पताका, परदे और चँवर बनाये॥ १ ॥

**चौ०** 
> दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना॥  
> जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही॥२॥

भावार्थ: जिसमें मणियोंके अनेकों सुन्दर दीपक हैं, उस विचित्र मण्डपका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। जिस मण्डपमें श्रीजानकीजी दुलहिन होंगी, किस कविकी ऐसी बुद्धि है जो उसका वर्णन कर सके॥ २ ॥

**चौ०** 
> दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर॥  
> जनक भवन कै सोभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी॥३॥

भावार्थ: जिस मण्डपमें रूप और गुणोंके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी दूल्हे होंगे, वह मण्डप तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होना ही चाहिये। जनकजीके महलकी जैसी शोभा है, वैसी ही शोभा नगरके प्रत्येक घरकी दिखायी देती है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी॥  
> जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा॥४॥

भावार्थ: उस समय जिसने तिरहुतको देखा, उसे चौदह भुवन तुच्छ जान पड़े। जनकपुरमें नीचके घर भी उस समय जो सम्पदा सुशोभित थी, उसे देखकर इन्द्र भी मोहित हो जाता था॥ ४ ॥

**दो०** 
> बसइ नगर जेहिं लच्छि करि कपट नारि बर बेषु।  
> तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु॥२८९॥

भावार्थ: जिस नगरमें साक्षात्‌ लक्ष्मीजी कपटसे स्त्रीका सुन्दर वेष बनाकर बसती हैं, उस पुरकी शोभाका वर्णन करनेमें सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं॥ २८९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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