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title: "बालकाण्ड दोहा 285"
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# बालकाण्ड · दोहा 285

दशरथजीके पास जनकजीका दूत भेजना,अयोध्यासे बारातका प्रस्थान

**चौ०** 
> जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानू॥  
> जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥१॥

भावार्थ: हे रघुकुलरूपी कमलवनके सूर्य! हे राक्षसोंके कुलरूपी घने जंगलको जलानेवाले अग्नि! आपकी जय हो! हे देवता, ब्राह्मण और गौका हित करनेवाले ! आपकी जय हो। हे मद, मोह, क्रोध और भ्रमके हरनेवाले! आपकी जय हो॥ १ ॥

**चौ०** 
> बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर॥  
> सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा॥२॥

भावार्थ: हे विनय, शील, कृपा आदि गुणोंके समुद्र और वचनोंकी रचनामें अत्यन्त चतुर! आपकी जय हो। हे सेवकोंको सुख देनेवाले, सब अङ्गोंसे सुन्दर और शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी छबि धारण करनेवाले! आपकी जय हो॥ २ ॥

**चौ०** 
> करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा॥  
> अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता॥३॥

भावार्थ: मैं एक मुखसे आपकी क्या प्रशंसा करूँ ? हे महादेवजीके मनरूपी मानसरोवरके हंस! आपकी जय हो। मैंने अनजानमें आपको बहुत-से अनुचित वचन कहे। हे क्षमाके मन्दिर दोनों भाई! मुझे क्षमा कीजिये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू॥  
> अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने॥४॥

भावार्थ: हे रघुकुलके पताकास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। ऐसा कहकर परशुरामजी तपके लिये वनको चले गये। [ यह देखकर ] दुष्ट राजालोग बिना ही कारणके ( मनःकल्पित ) डरसे ( रामचन्द्रजीसे तो परशुरामजी भी हार गये, हमने इनका अपमान किया था, अब कहीं ये उसका बदला न लें, इस व्यर्थके डरसे ) डर गये, वे कायर चुपकेसे जहाँ-तहाँ भाग गये॥ ४ ॥

**दो०** 
> देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल।  
> हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल॥२८५॥

भावार्थ: देवताओंने नगाड़े बजाये, वे प्रभुके ऊपर फूल बरसाने लगे। जनकपुरके स्त्री-पुरुष सब हर्षित हो गये। उनका मोहमय ( अज्ञानसे उत्पन्न ) शूल मिट गया॥ २८५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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