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title: "बालकाण्ड दोहा 284"
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# बालकाण्ड · दोहा 284

**चौ०** 
> देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना॥  
> जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ॥१॥

भावार्थ: देवता, दैत्य, राजा या और बहुत-से योद्धा, वे चाहे बलमें हमारे बराबर हों, चाहे अधिक बलवान्‌ हों, यदि रणमें हमें कोई भी ललकारे तो हम उससे सुखपूर्वक लड़ेंगे, चाहे काल ही क्यों न हो ?॥ १ ॥

**चौ०** 
> छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहि पावँर आना॥  
> कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी॥२॥

भावार्थ: क्षत्रियका शरीर धरकर जो युद्धमें डर गया, उस नीचने अपने कुलपर कलङ्क लगा दिया। मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, कुलकी प्रशंसा करके नहीं, कि रघुवंशी रणमें कालसे भी नहीं डरते॥ २ ॥

**चौ०** 
> बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई॥  
> सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के॥३॥

भावार्थ: ब्राह्मणवंशकी ऐसी ही प्रभुता ( महिमा ) है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है [ अथवा जो भयरहित होता है वह भी आपसे डरता है ]। श्रीरघुनाथजीके कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजीकी बुद्धिके परदे खुल गये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥  
> देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥४॥

भावार्थ: [ परशुरामजीने कहा— ] हे राम! हे लक्ष्मीपति! धनुषको हाथमें [ अथवा लक्ष्मीपति विष्णुका धनुष ] लीजिये और इसे खींचिये, जिससे मेरा सन्देह मिट जाय। परशुरामजी धनुष देने लगे, तब वह आप ही चला गया। तब परशुरामजीके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ॥ ४ ॥

**दो०** 
> जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात।  
> जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेमु अमात॥२८४॥

भावार्थ: तब उन्होंने श्रीरामजीका प्रभाव जाना, [ जिसके कारण ] उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। वे हाथ जोड़कर वचन बोले—प्रेम उनके हृदयमें समाता न था—॥ २८४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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