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title: "बालकाण्ड दोहा 283"
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# बालकाण्ड · दोहा 283

**चौ०** 
> निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥  
> चाप स्रुवा सर आहुति जानू। कोपु मोर अति घोर कृसानू॥१॥

भावार्थ: तू मुझे निरा ब्राह्मण ही समझता है ? मैं जैसा विप्र हूँ, तुझे सुनाता हूँ। धनुषको स्रुवा, बाणको आहुति और मेरे क्रोधको अत्यन्त भयङ्कर अग्नि जान॥ १ ॥

**चौ०** 
> समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई॥  
> मैं एहिं परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे॥२॥

भावार्थ: चतुरंगिणी सेना सुन्दर समिधाएँ ( यज्ञमें जलायी जानेवाली लकड़ियाँ ) हैं। बड़े-बड़े राजा उसमें आकर बलिके पशु हुए हैं, जिनको मैंने इसी फरसेसे काटकर बलि दिया है। ऐसे करोड़ों जपयुक्त रणयज्ञ मैंने किये हैं ( अर्थात्‌ जैसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक ‘स्वाहा’ शब्दके साथ आहुति दी जाती है, उसी प्रकार मैंने पुकार-पुकारकर राजाओंकी बलि दी है )॥ २ ॥

**चौ०** 
> मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें॥  
> भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा॥३॥

भावार्थ: मेरा प्रभाव तुझे मालूम नहीं है, इसीसे तू ब्राह्मणके धोखे मेरा निरादर करके बोल रहा है। धनुष तोड़ डाला, इससे तेरा घमंड बहुत बढ़ गया है। ऐसा अहंकार है, मानो संसारको जीतकर खड़ा है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी॥  
> छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं केहि हेतु करौं अभिमाना॥४॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीने कहा—हे मुनि! विचारकर बोलिये। आपका क्रोध बहुत बड़ा है। और मेरी भूल बहुत छोटी है। पुराना धनुष था, छूते ही टूट गया। मैं किस कारण अभिमान करूँ ?॥ ४ ॥

**दो०** 
> जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।  
> तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ॥२८३॥

भावार्थ: हे भृगुनाथ! यदि हम सचमुच ब्राह्मण कहकर निरादर करते हैं, तो यह सत्य सुनिये, फिर संसारमें ऐसा कौन योद्धा है जिसे हम डरके मारे मस्तक नवायें ?॥ २८३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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