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title: "बालकाण्ड दोहा 282"
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# बालकाण्ड · दोहा 282

**चौ०** 
> देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी॥  
> नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा॥१॥

भावार्थ: आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किये देखकर और वीर समझकर बालकको क्रोध आ गया। वह आपका नाम तो जानता था, पर उसने आपको पहचाना नहीं। अपने वंश ( रघुवंश ) के स्वभावके अनुसार उसने उत्तर दिया॥ १ ॥

**चौ०** 
> जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं॥  
> छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी॥२॥

भावार्थ: यदि आप मुनिकी तरह आते, तो हे स्वामी! बालक आपके चरणोंकी धूलि सिरपर रखता। अनजानेकी भूलको क्षमा कर दीजिये। ब्राह्मणोंके हृदयमें बहुत अधिक दया होनी चाहिये॥ २ ॥

**चौ०** 
> हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा। कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा॥  
> राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा॥३॥

भावार्थ: हे नाथ! हमारी और आपकी बराबरी कैसी ? कहिये न, कहाँ चरण और कहाँ मस्तक! कहाँ मेरा राममात्र छोटा-सा नाम और कहाँ आपका परशुसहित बड़ा नाम॥ ३ ॥

**चौ०** 
> देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥  
> सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥४॥

भावार्थ: हे देव! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके परम पवित्र [ शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता—ये ] नौ गुण हैं। हम तो सब प्रकारसे आपसे हारे हैं। हे विप्र! हमारे अपराधोंको क्षमा कीजिये॥ ४ ॥

**दो०** 
> बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।  
> बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम॥२८२॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीने परशुरामजीको बार-बार ‘मुनि’ और ‘विप्रवर’ कहा। तब भृगुपति ( परशुरामजी ) कुपित होकर [ अथवा क्रोधकी हँसी हँसकर ] बोले—तू भी अपने भाईके समान ही टेढ़ा है॥ २८२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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