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title: "बालकाण्ड दोहा 280"
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# बालकाण्ड · दोहा 280

**चौ०** 
> बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥  
> भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥१॥

भावार्थ: हाथ चलता नहीं, क्रोधसे छाती जली जाती है। [ हाय! ] राजाओंका घातक यह कुठार भी कुण्ठित हो गया। विधाता विपरीत हो गया, इससे मेरा स्वभाव बदल गया, नहीं तो भला, मेरे हृदयमें किसी समय भी कृपा कैसी ?॥ १ ॥

**चौ०** 
> आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा॥  
> बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥२॥

भावार्थ: आज दया मुझे यह दुःसह दुःख सहा रही है। यह सुनकर लक्ष्मणजीने मुसकराकर सिर नवाया [ और कहा— ] आपकी कृपारूपी वायु भी आपकी मूर्तिके अनुकूल ही है, वचन बोलते हैं, मानो फूल झड़ रहे हैं!॥ २ ॥

**चौ०** 
> जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता॥  
> देखु जनक हठि बालकु एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू॥३॥

भावार्थ: हे मुनि! यदि कृपा करनेसे आपका शरीर जला जाता है, तो क्रोध होनेपर तो शरीरकी रक्षा विधाता ही करेंगे। [ परशुरामजीने कहा— ] हे जनक! देख, यह मूर्ख बालक हठ करके यमपुरीमें घर ( निवास ) करना चाहता है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृपु ढोटा॥  
> बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं॥४॥

भावार्थ: इसको शीघ्र ही आँखोंकी ओट क्यों नहीं करते ? यह राजपुत्र देखनेमें छोटा है, पर है बड़ा खोटा। लक्ष्मणजीने हँसकर मन-ही-मन कहा—आँख मूँद लेनेपर कहीं कोई नहीं है॥ ४ ॥

**दो०** 
> परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।  
> संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु॥२८०॥

भावार्थ: तब परशुरामजी हृदयमें अत्यन्त क्रोध भरकर श्रीरामजीसे बोले—अरे शठ! तू शिवजीका धनुष तोड़कर उलटा हमींको ज्ञान सिखाता है!॥ २८० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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