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title: "बालकाण्ड दोहा 278"
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# बालकाण्ड · दोहा 278

**चौ०** 
> मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया॥  
> टूट चाप नहिं जुरिहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने॥१॥

भावार्थ: हे मुनिराज! मैं आपका दास हूँ। अब क्रोध त्यागकर दया कीजिये। टूटा हुआ धनुष क्रोध करनेसे जुड़ नहीं जायगा। खड़े-खड़े पैर दुखने लगे होंगे, बैठ जाइये॥ १ ॥

**चौ०** 
> जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई॥  
> बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं॥२॥

भावार्थ: यदि धनुष अत्यन्त ही प्रिय हो, तो कोई उपाय किया जाय और किसी बड़े गुणी ( कारीगर )को बुलाकर जुड़वा दिया जाय। लक्ष्मणजीके बोलनेसे जनकजी डर जाते हैं और कहते है—बस, चुप रहिये, अनुचित बोलना अच्छा नहीं॥ २ ॥

**चौ०** 
> थर थर काँपहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी॥  
> भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी॥३॥

भावार्थ: जनकपुरके स्त्री-पुरुष थर-थर काँप रहे हैं [ और मन-ही-मन कह रहे हैं कि ] छोटा कुमार बड़ा ही खोटा है। लक्ष्मणजीकी निर्भय वाणी सुन-सुनकर परशुरामजीका शरीर क्रोधसे जला जा रहा है और उनके बलकी हानि हो रही है ( उनका बल घट रहा है )॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा॥  
> मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसें॥४॥

भावार्थ: तब श्रीरामचन्द्रजीपर एहसान जनाकर परशुरामजी बोले—तेरा छोटा भाई समझकर मैं इसे बचा रहा हूँ। यह मनका मैला और शरीरका कैसा सुन्दर है, जैसे विषके रससे भरा हुआ सोनेका घड़ा!॥ ४ ॥

**दो०** 
> सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।  
> गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम॥२७८॥

भावार्थ: यह सुनकर लक्ष्मणजी फिर हँसे। तब श्रीरामचन्द्रजीने तिरछी नजरसे उनकी ओर देखा, जिससे लक्ष्मणजी सकुचाकर, विपरीत बोलना छोड़कर, गुरुजीके पास चले गये॥ २७८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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