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title: "बालकाण्ड दोहा 271"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-271"
lang: "hi"
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# बालकाण्ड · दोहा 271

**चौ०** 
> नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥  
> आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥ १ ॥

भावार्थ: हे नाथ! शिवजीके धनुषको तोड़नेवाला आपका कोई एक दास ही होगा। क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? यह सुनकर क्रोधी मुनि रिसाकर बोले— ॥ १ ॥

**चौ०** 
> सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥  
> सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥२॥

भावार्थ: सेवक वह है जो सेवाका काम करे। शत्रुका काम करके तो लड़ाई ही करनी चाहिये। हे राम! सुनो, जिसने शिवजीके धनुषको तोड़ा है, वह सहस्रबाहुके समान मेरा शत्रु है॥ २ ॥

**चौ०** 
> सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥  
> सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥३॥

भावार्थ: वह इस समाजको छोड़कर अलग हो जाय, नहीं तो सभी राजा मारे जायँगे। मुनिके वचन सुनकर लक्ष्मणजी मुसकराये और परशुरामजीका अपमान करते हुए बोले— ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥  
> एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥४॥

भावार्थ: हे गोसाईं! लड़कपनमें हमने बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डालीं। किन्तु आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। इसी धनुषपर इतनी ममता किस कारणसे है? यह सुनकर भृगुवंशकी ध्वजास्वरूप परशुरामजी कुपित होकर कहने लगे— ॥ ४ ॥

**दो०** 
> रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।  
> धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥२७१॥

भावार्थ: अरे राजपुत्र! कालके वश होनेसे तुझे बोलनेमें कुछ भी होश नहीं है। सारे संसारमें विख्यात शिवजीका यह धनुष क्या धनुहीके समान है?॥ २७१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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