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title: "बालकाण्ड दोहा 270"
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# बालकाण्ड · दोहा 270

श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम-संवाद

**चौ०** 
> समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥  
> सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥१॥

भावार्थ: जिस कारण सब राजा आये थे, राजा जनकने वे सब समाचार कह सुनाये। जनकके वचन सुनकर परशुरामजीने फिरकर दूसरी ओर देखा तो धनुषके टुकड़े पृथ्वीपर पड़े हुए दिखायी दिये॥ १ ॥

**चौ०** 
> अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥  
> बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥२॥

भावार्थ: अत्यन्त क्रोधमें भरकर वे कठोर वचन बोले—रे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा? उसे शीघ्र दिखा, नहीं तो अरे मूढ़! आज मैं जहाँतक तेरा राज्य है, वहाँतककी पृथ्वी उलट दूँगा॥ २ ॥

**चौ०** 
> अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥  
> सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥३॥

भावार्थ: राजाको अत्यन्त डर लगा, जिसके कारण वे उत्तर नहीं देते। यह देखकर कुटिल राजा मनमें बड़े प्रसन्न हुए। देवता, मुनि, नाग और नगरके स्त्री-पुरुष सभी सोच करने लगे, सबके हृदयमें बड़ा भय है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥  
> भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥४॥

भावार्थ: सीताजीकी माता मनमें पछता रही हैं कि हाय! विधाताने अब बनी-बनायी बात बिगाड़ दी। परशुरामजीका स्वभाव सुनकर सीताजीको आधा क्षण भी कल्पके समान बीतने लगा॥ ४ ॥

**दो०** 
> सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।  
> हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥२७०॥

भावार्थ: तब श्रीरामचन्द्रजी सब लोगोंको भयभीत देखकर और सीताजीको डरी हुई जानकर बोले—उनके हृदयमें न कुछ हर्ष था, न विषाद— ॥ २७० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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