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title: "बालकाण्ड दोहा 269"
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# बालकाण्ड · दोहा 269

**चौ०** 
> देखत भृगुपति बेषु कराला । उठे सकल भय बिकल भुआला ॥  
> पितु समेत कहि कहि निज नामा । लगे करन सब दंड प्रनामा ॥ १ ॥

भावार्थ: परशुरामजीका भयानक वेष देखकर सब राजा भयसे व्याकुल हो उठ खड़े हुए और पितासहित अपना नाम कह-कहकर सब दण्डवत्-प्रणाम करने लगे॥ १ ॥

**चौ०** 
> जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी । सो जानइ जनु आइ खुटानी ॥  
> जनक बहोरि आइ सिरु नावा । सीय बोलाइ प्रनामु करावा ॥ २ ॥

भावार्थ: परशुरामजी हित समझकर भी सहज ही जिसकी ओर देख लेते हैं, वह समझता है मानो मेरी आयु पूरी हो गयी। फिर जनकजीने आकर सिर नवाया और सीताजीको बुलाकर प्रणाम कराया॥ २ ॥

**चौ०** 
> आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं । निज समाज लै गईं सयानीं ॥  
> बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥ ३ ॥

भावार्थ: परशुरामजीने सीताजीको आशीर्वाद दिया। सखियाँ हर्षित हुईं और [ वहाँ अब अधिक देर ठहरना ठीक न समझकर ] वे सयानी सखियाँ उनको अपनी मण्डलीमें ले गयीं। फिर विश्वामित्रजी आकर मिले और उन्होंने दोनों भाइयोंको उनके चरणकमलोंपर गिराया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥  
> रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥४॥

भावार्थ: [ विश्वामित्रजीने कहा— ] ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथके पुत्र हैं। उनकी सुन्दर जोड़ी देखकर परशुरामजीने आशीर्वाद दिया। कामदेवके भी मदको छुड़ानेवाले श्रीरामचन्द्रजीके अपार रूपको देखकर उनके नेत्र थकित ( स्तम्भित ) हो रहे॥ ४ ॥

**दो०** 
> बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।  
> पूँछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥२६९॥

भावार्थ: फिर सब देखकर, जानते हुए भी अनजानकी तरह जनकजीसे पूछते हैं कि कहो, यह बड़ी भारी भीड़ कैसी है? उनके शरीरमें क्रोध छा गया॥ २६९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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