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title: "बालकाण्ड दोहा 264"
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# बालकाण्ड · दोहा 264

**चौ०** 
> सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसें। छबिगन मध्य महाछबि जैसें॥  
> कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई॥१॥

भावार्थ: सखियोंके बीचमें सीताजी कैसी शोभित हो रही हैं; जैसे बहुत-सी छबियोंके बीचमें महाछबि हो। करकमलमें सुन्दर जयमाला है, जिसमें विश्वविजयकी शोभा छायी हुई है॥१॥

**चौ०** 
> तन सकोचु मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू॥  
> जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुअँरि चित्र अवरेखी॥२॥

भावार्थ: सीताजीके शरीरमें संकोच है, पर मनमें परम उत्साह है। उनका यह गुप्त प्रेम किसीको जान नहीं पड़ रहा है। समीप जाकर, श्रीरामजीकी शोभा देखकर राजकुमारी सीताजी चित्रमें लिखी-सी रह गयीं॥२॥

**चौ०** 
> चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई॥  
> सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई॥३॥

भावार्थ: चतुर सखीने यह दशा देखकर समझाकर कहा—सुहावनी जयमाला पहनाओ। यह सुनकर सीताजीने दोनों हाथोंसे माला उठायी, पर प्रेमके विवश होनेसे पहनायी नहीं जाती॥३॥

**चौ०** 
> सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला॥  
> गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली॥४॥

भावार्थ: [ उस समय उनके हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे हैं ] मानो डंडियोंसहित दो कमल चन्द्रमाको डरते हुए जयमाला दे रहे हों। इस छबिको देखकर सखियाँ गाने लगीं। तब सीताजीने श्रीरामजीके गलेमें जयमाला पहना दी॥४॥

**सो०** 
> रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन।  
> सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन॥२६४॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीके हृदयपर जयमाला देखकर देवता फूल बरसाने लगे। समस्त राजागण इस प्रकार सकुचा गये मानो सूर्यको देखकर कुमुदोंका समूह सिकुड़ गया हो॥२६४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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