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title: "बालकाण्ड दोहा 263"
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# बालकाण्ड · दोहा 263

जयमाल पहनाना

**चौ०** 
> झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई॥  
> बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए॥१॥

भावार्थ: झाँझ, मृदंग, शङ्ख, शहनाई, भेरी, ढोल और सुहावने नगाड़े आदि बहुत प्रकारके सुन्दर बाजे बज रहे हैं। जहाँ-तहाँ युवतियाँ मङ्गलगीत गा रही हैं॥१॥

**चौ०** 
> सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी॥  
> जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। पैरत थकें थाह जनु पाई॥२॥

भावार्थ: सखियोंसहित रानी अत्यन्त हर्षित हुई। मानो सूखते हुए धानपर पानी पड़ गया हो। जनकजीने सोच त्यागकर सुख प्राप्त किया। मानो तैरते-तैरते थके हुए पुरुषने थाह पा ली हो॥२॥

**चौ०** 
> श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे॥  
> सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती॥३॥

भावार्थ: धनुष टूट जानेपर राजालोग ऐसे श्रीहीन ( निस्तेज ) हो गये, जैसे दिनमें दीपककी शोभा जाती रहती है। सीताजीका सुख किस प्रकार वर्णन किया जाय; जैसे चातकी स्वातीका जल पा गयी हो॥३॥

**चौ०** 
> रामहि लखनु बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें॥  
> सतानंद तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा॥४॥

भावार्थ: श्रीरामजीको लक्ष्मणजी किस प्रकार देख रहे हैं, जैसे चन्द्रमाको चकोरका बच्चा देख रहा हो। तब शतानन्दजीने आज्ञा दी और सीताजीने श्रीरामजीके पास गमन किया॥४॥

**दो०** 
> संग सखीं सुंदर चतुर गावहिं मंगलचार।  
> गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार॥२६३॥

भावार्थ: साथमें सुन्दर चतुर सखियाँ मङ्गलाचारके गीत गा रही हैं; सीताजी बालहंसिनीकी चालसे चलीं। उनके अङ्गोंमें अपार शोभा है॥२६३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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