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title: "बालकाण्ड दोहा 257"
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# बालकाण्ड · दोहा 257

**चौ०** 
> काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे॥  
> देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुषु राम सुनु रानी॥१॥

भावार्थ: कामदेवने फूलोंका ही धनुष-बाण लेकर समस्त लोकोंको अपने वशमें कर रखा है। हे देवी! ऐसा जानकर सन्देह त्याग दीजिये। हे रानी! सुनिये, रामचन्द्रजी धनुषको अवश्य ही तोड़ेंगे॥१॥

**चौ०** 
> सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती॥  
> तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही॥२॥

भावार्थ: सखीके वचन सुनकर रानीको [ श्रीरामजीके सामर्थ्यके सम्बन्धमें ] विश्वास हो गया। उनकी उदासी मिट गयी और श्रीरामजीके प्रति उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। उस समय श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सीताजी भयभीत हृदयसे जिस-तिस [ देवता ] से विनती कर रही हैं॥२॥

**चौ०** 
> मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी॥  
> करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई॥३॥

भावार्थ: वे व्याकुल होकर मन-ही-मन मना रही हैं—हे महेश-भवानी! मुझपर प्रसन्न होइये, मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे सुफल कीजिये और मुझपर स्नेह करके धनुषके भारीपनको हर लीजिये॥३॥

**चौ०** 
> गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा॥  
> बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी॥ ४॥

भावार्थ: हे गणोंके नायक, वर देनेवाले देवता गणेशजी! मैंने आजहीके लिये तुम्हारी सेवा की थी। बार-बार मेरी विनती सुनकर धनुषका भारीपन बहुत ही कम कर दीजिये॥४॥

**दो०** 
> देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।  
> भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर॥२५७॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीकी ओर देख-देखकर सीताजी धीरज धरकर देवताओंको मना रही हैं। उनके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू भरे हैं और शरीरमें रोमाञ्च हो रहा है॥२५७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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