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title: "बालकाण्ड दोहा 256"
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# बालकाण्ड · दोहा 256

**चौ०** 
> सखि सब कौतुकु देखनिहारे। जेउ कहावत हितू हमारे॥  
> कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं॥१॥

भावार्थ: हे सखी! ये जो हमारे हितू कहलाते हैं, वे भी सब तमाशा देखनेवाले हैं। कोई भी [ इनके ] गुरु विश्वामित्रजीको समझाकर नहीं कहता कि ये ( रामजी ) बालक हैं, इनके लिये ऐसा हठ अच्छा नहीं। [ जो धनुष रावण और बाण-जैसे जगद्विजयी वीरोंके हिलाये न हिल सका, उसे तोड़नेके लिये मुनि विश्वामित्रजीका रामजीको आज्ञा देना और रामजीका उसे तोड़नेके लिये चल देना रानीको हठ जान पड़ा, इसलिये वे कहने लगीं कि गुरु विश्वामित्रजीको कोई समझाता भी नहीं। ]॥ १ ॥

**चौ०** 
> रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा॥  
> सो धनु राजकुअँर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं॥२॥

भावार्थ: रावण और बाणासुरने जिस धनुषको छुआतक नहीं और सब राजा घमंड करके हार गये, वही धनुष इस सुकुमार राजकुमारके हाथमें दे रहे हैं। हंसके बच्चे भी कहीं मन्दराचल पहाड़ उठा सकते हैं?॥ २ ॥

**चौ०** 
> भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी॥  
> बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी॥३॥

भावार्थ: [ और तो कोई समझाकर कहे या नहीं, राजा तो बड़े समझदार और ज्ञानी हैं, उन्हें तो गुरुको समझानेकी चेष्टा करनी चाहिये थी, परन्तु मालूम होता है ] राजाका भी सारा सयानापन समाप्त हो गया। हे सखी! विधाताकी गति कुछ जाननेमें नहीं आती [ यों कहकर रानी चुप हो रहीं ]। तब एक चतुर ( रामजीके महत्त्वको जाननेवाली ) सखी कोमल वाणीसे बोली—हे रानी! तेजवान्‌को [ देखनेमें छोटा होनेपर भी ] छोटा नहीं गिनना चाहिये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा॥  
> रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा॥४॥

भावार्थ: कहाँ घड़ेसे उत्पन्न होनेवाले [ छोटे-से ] मुनि अगस्त्य और कहाँ अपार समुद्र? किन्तु उन्होंने उसे सोख लिया, जिसका सुयश सारे संसारमें छाया हुआ है। सूर्यमण्डल देखनेमें छोटा लगता है, पर उसके उदय होते ही तीनों लोकोंका अन्धकार भाग जाता है॥ ४ ॥

**दो०** 
> मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।  
> महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब॥२५६॥

भावार्थ: जिसके वशमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सभी देवता हैं, वह मन्त्र अत्यन्त छोटा होता है। महान्‌ मतवाले गजराजको छोटा-सा अंकुश वशमें कर लेता है॥ २५६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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