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title: "बालकाण्ड दोहा 255"
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# बालकाण्ड · दोहा 255

**चौ०** 
> नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी॥  
> मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने॥१॥

भावार्थ: राजाओंकी आशारूपी रात्रि नष्ट हो गयी। उनके वचनरूपी तारोंके समूहका चमकना बंद हो गया ( वे मौन हो गये )। अभिमानी राजारूपी कुमुद संकुचित हो गये और कपटी राजारूपी उल्लू छिप गये॥ १ ॥

**चौ०** 
> भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा॥  
> गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा॥२॥

भावार्थ: मुनि और देवतारूपी चकवे शोकरहित हो गये। वे फूल बरसाकर अपनी सेवा प्रकट कर रहे हैं। प्रेमसहित गुरुके चरणोंकी वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजीने मुनियोंसे आज्ञा माँगी॥ २ ॥

**चौ०** 
> सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी॥  
> चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी॥३॥

भावार्थ: समस्त जगत्‌के स्वामी श्रीरामजी सुन्दर मतवाले श्रेष्ठ हाथीकी-सी चालसे स्वाभाविक ही चले। श्रीरामचन्द्रजीके चलते ही नगरभरके सब स्त्री-पुरुष सुखी हो गये और उनके शरीर रोमाञ्चसे भर गये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे॥  
> तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं॥४॥

भावार्थ: उन्होंने पितर और देवताओंकी वन्दना करके अपने पुण्योंका स्मरण किया। यदि हमारे पुण्योंका कुछ भी प्रभाव हो, तो हे गणेश गोसाईं! रामचन्द्रजी शिवजीके धनुषको कमलकी डंडीकी भाँति तोड़ डालें॥ ४ ॥

**दो०** 
> रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ।  
> सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ॥२५५॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीको [ वात्सल्य ] प्रेमके साथ देखकर और सखियोंको समीप बुलाकर सीताजीकी माता स्नेहवश बिलखकर ( विलाप करती हुई-सी ) ये वचन बोलीं— ॥ २५५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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