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title: "बालकाण्ड दोहा 254"
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# बालकाण्ड · दोहा 254

**चौ०** 
> लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले॥  
> सकल लोग सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने॥१॥

भावार्थ: ज्यों ही लक्ष्मणजी क्रोधभरे वचन बोले कि पृथ्वी डगमगा उठी और दिशाओंके हाथी काँप गये। सभी लोग और सब राजा डर गये। सीताजीके हृदयमें हर्ष हुआ और जनकजी सकुचा गये॥ १ ॥

**चौ०** 
> गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं॥  
> सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे॥२॥

भावार्थ: गुरु विश्वामित्रजी, श्रीरघुनाथजी और सब मुनि मनमें प्रसन्न हुए और बार-बार पुलकित होने लगे। श्रीरामचन्द्रजीने इशारेसे लक्ष्मणको मना किया और प्रेमसहित अपने पास बैठा लिया॥ २ ॥

**चौ०** 
> बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी॥  
> उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥३॥

भावार्थ: विश्वामित्रजी शुभ समय जानकर अत्यन्त प्रेमभरी वाणी बोले—हे राम! उठो, शिवजीका धनुष तोड़ो और हे तात! जनकका सन्ताप मिटाओ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा॥  
> ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ॥४॥

भावार्थ: गुरुके वचन सुनकर श्रीरामजीने चरणोंमें सिर नवाया। उनके मनमें न हर्ष हुआ, न विषाद; और वे अपनी ऐंड़ ( खड़े होनेकी शान ) से जवान सिंहको भी लजाते हुए सहज स्वभावसे ही उठ खड़े हुए॥ ४ ॥

**दो०** 
> उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।  
> बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग॥२५४॥

भावार्थ: मञ्चरूपी उदयाचलपर रघुनाथजीरूपी बालसूर्यके उदय होते ही सब संतरूपी कमल खिल उठे और नेत्ररूपी भौंरे हर्षित हो गये॥ २५४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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