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title: "बालकाण्ड दोहा 248"
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# बालकाण्ड · दोहा 248

बन्दीजनोंद्वारा जनकप्रतिज्ञाकी घोषणा

**चौ०** 
> चलीं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी॥  
> सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी॥१॥

भावार्थ: सयानी सखियाँ सीताजीको साथ लेकर मनोहर वाणीसे गीत गाती हुई चलीं। सीताजीके नवल शरीरपर सुन्दर साड़ी सुशोभित है। जगज्जननीकी महान्‌ छबि अतुलनीय है॥ १ ॥

**चौ०** 
> भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए॥  
> रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी॥२॥

भावार्थ: सब आभूषण अपनी-अपनी जगहपर शोभित हैं, जिन्हें सखियोंने अंग-अंगमें भलीभाँति सजाकर पहनाया है। जब सीताजीने रंगभूमिमें पैर रखा, तब उनका [ दिव्य ] रूप देखकर स्त्री-पुरुष—सभी मोहित हो गये॥ २ ॥

**चौ०** 
> हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि प्रसून अपछरा गाईं॥  
> पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला॥३॥

भावार्थ: देवताओंने हर्षित होकर नगाड़े बजाये और पुष्प बरसाकर अप्सराएँ गाने लगीं। सीताजीके करकमलोंमें जयमाला सुशोभित है। सब राजा चकित होकर अचानक उनकी ओर देखने लगे॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा॥  
> मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई॥४॥

भावार्थ: सीताजी चकित चित्तसे श्रीरामजीको देखने लगीं, तब सब राजालोग मोहके वश हो गये। सीताजीने मुनिके पास [ बैठे हुए ] दोनों भाइयोंको देखा तो उनके नेत्र अपना खजाना पाकर ललचाकर वहीं ( श्रीरामजीमें ) जा लगे ( स्थिर हो गये )॥ ४ ॥

**दो०** 
> गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि।  
> लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि॥२४८॥

भावार्थ: परन्तु गुरुजनोंकी लाजसे तथा बहुत बड़े समाजको देखकर सीताजी सकुचा गयीं। वे श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें लाकर सखियोंकी ओर देखने लगीं॥ २४८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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