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title: "बालकाण्ड दोहा 245"
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# बालकाण्ड · दोहा 245

**चौ०** 
> प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे॥  
> असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं॥१॥

भावार्थ: प्रभुको देखकर सब राजा हृदयमें ऐसे हार गये ( निराश एवं उत्साहहीन हो गये ) जैसे पूर्ण चन्द्रमाके उदय होनेपर तारे प्रकाशहीन हो जाते हैं। [ उनके तेजको देखकर ] सबके मनमें ऐसा विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी ही धनुषको तोड़ेंगे, इसमें सन्देह नहीं॥ १ ॥

**चौ०** 
> बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला॥  
> अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई॥२॥

भावार्थ: [ इधर उनके रूपको देखकर सबके मनमें यह निश्चय हो गया कि ] शिवजीके विशाल धनुषको [ जो सम्भव है न टूट सके ] बिना तोड़े भी सीताजी श्रीरामचन्द्रजीके ही गलेमें जयमाल डालेंगी ( अर्थात्‌ दोनों तरहसे ही हमारी हार होगी और विजय श्रीरामचन्द्रजीके हाथ रहेगी )। [ यों सोचकर वे कहने लगे— ] हे भाई! ऐसा विचारकर यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर अपने-अपने घर चलो॥ २ ॥

**चौ०** 
> बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी॥  
> तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा॥३॥

भावार्थ: दूसरे राजा, जो अविवेकसे अंधे हो रहे थे और अभिमानी थे, यह बात सुनकर बहुत हँसे। [ उन्होंने कहा— ] धनुष तोड़नेपर भी विवाह होना कठिन है ( अर्थात्‌ सहजहीमें हम जानकीको हाथसे जाने नहीं देंगे ), फिर बिना तोड़े तो राजकुमारीको ब्याह ही कौन सकता है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ॥  
> यह सुनि अवर महिप मुसुकाने। धरमसील हरिभगत सयाने॥४॥

भावार्थ: काल ही क्यों न हो, एक बार तो सीताके लिये उसे भी हम युद्धमें जीत लेंगे। यह घमण्डकी बात सुनकर दूसरे राजा, जो धर्मात्मा, हरिभक्त और सयाने थे, मुसकराये॥ ४ ॥

**सो०** 
> सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।  
> जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे॥२४५॥

भावार्थ: [ उन्होंने कहा— ] राजाओंके गर्व दूर करके ( जो धनुष किसीसे नहीं टूट सकेगा उसे तोड़कर ) श्रीरामचन्द्रजी सीताजीको ब्याहेंगे। [ रही युद्धकी बात, सो ] महाराज दशरथके रणमें बाँके पुत्रोंको युद्धमें तो जीत ही कौन सकता है॥ २४५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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