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title: "बालकाण्ड दोहा 242"
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# बालकाण्ड · दोहा 242

**चौ०** 
> बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा॥  
> जनक जाति अवलोकहिं कैसें। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें॥१॥

भावार्थ: विद्वानोंको प्रभु विराट्‌रूपमें दिखायी दिये, जिसके बहुत-से मुँह, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। जनकजीके सजातीय ( कुटुम्बी ) प्रभुको किस तरह ( कैसे प्रिय रूपमें ) देख रहे हैं, जैसे सगे सजन ( सम्बन्धी ) प्रिय लगते हैं॥१॥

**चौ०** 
> सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी॥  
> जोगिन्ह परम तत्त्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा॥२॥

भावार्थ: जनकसमेत रानियाँ उन्हें अपने बच्चेके समान देख रही हैं, उनकी प्रीतिका वर्णन नहीं किया जा सकता। योगियोंको वे शान्त, शुद्ध, सम और स्वतःप्रकाश परम तत्त्वके रूपमें दीखे॥ २ ॥

**चौ०** 
> हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता॥  
> रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया॥३॥

भावार्थ: हरिभक्तोंने दोनों भाइयोंको सब सुखोंके देनेवाले इष्टदेवके समान देखा। सीताजी जिस भावसे श्रीरामचन्द्रजीको देख रही हैं, वह स्नेह और सुख तो कहनेमें ही नहीं आता॥ ३ ॥

**चौ०** 
> उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ॥  
> एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥४॥

भावार्थ: उस ( स्नेह और सुख ) का वे हृदयमें अनुभव कर रही हैं, पर वे भी उसे कह नहीं सकतीं। फिर कोई कवि उसे किस प्रकार कह सकता है। इस प्रकार जिसका जैसा भाव था, उसने कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजीको वैसा ही देखा॥ ४ ॥

**दो०** 
> राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।  
> सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर॥२४२॥

भावार्थ: सुन्दर साँवले और गोरे शरीरवाले तथा विश्वभरके नेत्रोंको चुरानेवाले कोसलाधीशके कुमार राजसमाजमें [ इस प्रकार ] सुशोभित हो रहे हैं॥ २४२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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