---
title: "बालकाण्ड दोहा 240"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-240"
lang: "hi"
---

# बालकाण्ड · दोहा 240

**चौ०** 
> सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई॥  
> लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई॥१॥

भावार्थ: चलकर सीताजीके स्वयंवरको देखना चाहिये। देखें ईश्वर किसको बड़ाई देते हैं। लक्ष्मणजीने कहा—हे नाथ! जिसपर आपकी कृपा होगी, वही बड़ाईका पात्र होगा ( धनुष तोड़नेका श्रेय उसीको प्राप्त होगा )॥१॥

**चौ०** 
> हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी॥  
> पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला॥२॥

भावार्थ: इस श्रेष्ठ वाणीको सुनकर सब मुनि प्रसन्न हुए। सभीने सुख मानकर आशीर्वाद दिया। फिर मुनियोंके समूहसहित कृपालु श्रीरामचन्द्रजी धनुषयज्ञशाला देखने चले॥२॥

**चौ०** 
> रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई॥  
> चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी॥३॥

भावार्थ: दोनों भाई रंगभूमिमें आये हैं, ऐसी खबर जब सब नगरनिवासियोंने पायी, तब बालक, जवान, बूढ़े, स्त्री, पुरुष सभी घर और काम-काजको भुलाकर चल दिये॥३॥

**चौ०** 
> देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी॥  
> तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहु सब काहू॥४॥

भावार्थ: जब जनकजीने देखा कि बड़ी भीड़ हो गयी है, तब उन्होंने सब विश्वासपात्र सेवकोंको बुलवा लिया और कहा—तुमलोग तुरंत सब लोगोंके पास जाओ और सब किसीको यथायोग्य आसन दो॥४॥

**दो०** 
> कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।  
> उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि॥२४०॥

भावार्थ: उन सेवकोंने कोमल और नम्र वचन कहकर उत्तम, मध्यम, नीच और लघु ( सभी श्रेणीके ) स्त्री-पुरुषोंको अपने-अपने योग्य स्थानपर बैठाया॥२४०॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-239  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-241

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
