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title: "बालकाण्ड दोहा 238"
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# बालकाण्ड · दोहा 238

श्रीराम-लक्ष्मणसहित विश्वामित्रका यज्ञशालामें प्रवेश

**चौ०** 
> घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥  
> कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥१॥

भावार्थ: फिर यह घटता-बढ़ता है और विरहिणी स्त्रियोंको दुःख देनेवाला है; राहु अपनी सन्धिमें पाकर इसे ग्रस लेता है। चकवेको [ चकवीके वियोगका ] शोक देनेवाला और कमलका वैरी ( उसे मुरझा देनेवाला ) है। हे चन्द्रमा! तुझमें बहुत-से अवगुण हैं [ जो सीताजीमें नहीं हैं ]॥१॥

**चौ०** 
> बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोषु बड़ अनुचित कीन्हे॥  
> सिय मुखछबि बिधु ब्याज बखानी। गुर पहिं चले निसा बड़ि जानी॥२॥

भावार्थ: अतः जानकीजीके मुखकी तुझे उपमा देनेमें बड़ा अनुचित कर्म करनेका दोष लगेगा। इस प्रकार चन्द्रमाके बहाने सीताजीके मुखकी छबिका वर्णन करके, बड़ी रात हो गयी जान वे गुरुजीके पास चले॥२॥

**चौ०** 
> करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा॥  
> बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे॥३॥

भावार्थ: मुनिके चरणकमलोंमें प्रणाम करके, आज्ञा पाकर उन्होंने विश्राम किया; रात बीतनेपर श्रीरघुनाथजी जागे और भाईको देखकर ऐसा कहने लगे—॥३॥

**चौ०** 
> उयउ अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता॥  
> बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी॥४॥

भावार्थ: हे तात! देखो, कमल, चक्रवाक और समस्त संसारको सुख देनेवाला अरुणोदय हुआ है। लक्ष्मणजी दोनों हाथ जोड़कर प्रभुके प्रभावको सूचित करनेवाली कोमल वाणी बोले—॥४॥

**दो०** 
> अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन।  
> जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन॥२३८॥

भावार्थ: अरुणोदय होनेसे कुमुदिनी सकुचा गयी और तारागणोंका प्रकाश फीका पड़ गया, जिस प्रकार आपका आना सुनकर सब राजा बलहीन हो गये हैं॥२३८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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