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title: "बालकाण्ड दोहा 237"
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# बालकाण्ड · दोहा 237

**चौ०** 
> हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई॥  
> राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं॥१॥

भावार्थ: हृदयमें सीताजीके सौन्दर्यकी सराहना करते हुए दोनों भाई गुरुजीके पास गये। श्रीरामचन्द्रजीने विश्वामित्रजीसे सब कुछ कह दिया। क्योंकि उनका सरल स्वभाव है, छल तो उसे छूता भी नहीं है॥१॥

**चौ०** 
> सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही॥  
> सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे॥२॥

भावार्थ: फूल पाकर मुनिने पूजा की। फिर दोनों भाइयोंको आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे मनोरथ सफल हों। यह सुनकर श्रीराम-लक्ष्मण सुखी हुए॥२॥

**चौ०** 
> करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी॥  
> बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई॥३॥

भावार्थ: श्रेष्ठ विज्ञानी मुनि विश्वामित्रजी भोजन करके कुछ प्राचीन कथाएँ कहने लगे। [ इतनेमें ] दिन बीत गया और गुरुकी आज्ञा पाकर दोनों भाई सन्ध्या करने चले॥३॥

**चौ०** 
> प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा॥  
> बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥४॥

भावार्थ: [ उधर ] पूर्व दिशामें सुन्दर चन्द्रमा उदय हुआ। श्रीरामचन्द्रजीने उसे सीताके मुखके समान देखकर सुख पाया। फिर मनमें विचार किया कि यह चन्द्रमा सीताजीके मुखके समान नहीं है॥४॥

**दो०** 
> जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।  
> सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक॥२३७॥

भावार्थ: खारे समुद्रमें तो इसका जन्म, फिर [ उसी समुद्रसे उत्पन्न होनेके कारण ] विष इसका भाई; दिनमें यह मलिन ( शोभाहीन, निस्तेज ) रहता है, और कलङ्की ( काले दागसे युक्त ) है। बेचारा गरीब चन्द्रमा सीताजीके मुखकी बराबरी कैसे पा सकता है?॥२३७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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