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title: "बालकाण्ड दोहा 233"
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# बालकाण्ड · दोहा 233

**चौ०** 
> सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा॥  
> मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के॥१॥

भावार्थ: दोनों सुन्दर भाई शोभाकी सीमा हैं। उनके शरीरकी आभा नीले और पीले कमलकी-सी है। सिरपर सुन्दर मोरपंख सुशोभित हैं। उनके बीच-बीचमें फूलोंकी कलियोंके गुच्छे लगे हैं॥१॥

**चौ०** 
> भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए॥  
> बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे॥२॥

भावार्थ: माथेपर तिलक और पसीनेकी बूँदें शोभायमान हैं। कानोंमें सुन्दर भूषणोंकी छबि छायी है। टेढ़ी भौंहें और घुँघराले बाल हैं। नये लाल कमलके समान रतनारे ( लाल ) नेत्र हैं॥२॥

**चौ०** 
> चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला॥  
> मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं॥३॥

भावार्थ: ठोड़ी, नाक और गाल बड़े सुन्दर हैं, और हँसीकी शोभा मनको मोल लिये लेती है। मुखकी छबि तो मुझसे कही ही नहीं जाती, जिसे देखकर बहुत-से कामदेव लजा जाते हैं॥३॥

**चौ०** 
> उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा॥  
> सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥ ४॥

भावार्थ: वक्षःस्थलपर मणियोंकी माला है। शङ्खके सदृश सुन्दर गला है। कामदेवके हाथीके बच्चेकी सूँड़के समान ( उतार-चढ़ाववाली एवं कोमल ) भुजाएँ हैं, जो बलकी सीमा हैं। जिसके बायें हाथमें फूलोंसहित दोना है, हे सखि! वह साँवला कुँअर तो बहुत ही सलोना है॥४॥

**दो०** 
> केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।  
> देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान॥२३३॥

भावार्थ: सिंहकी-सी ( पतली, लचीली ) कमरवाले, पीताम्बर धारण किये हुए, शोभा और शीलके भण्डार, सूर्यकुलके भूषण श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सखियाँ अपने-आपको भूल गयीं॥२३३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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