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title: "बालकाण्ड दोहा 231"
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# बालकाण्ड · दोहा 231

**चौ०** 
> तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई॥  
> पूजन गौरि सखीं लै आईं। करत प्रकासु फिरइ फुलवाईं॥१॥

भावार्थ: हे तात! यह वही जनकजीकी कन्या है जिसके लिये धनुषयज्ञ हो रहा है। सखियाँ इसे गौरीपूजनके लिये ले आयी हैं। यह फुलवाड़ीमें प्रकाश करती हुई फिर रही है॥१॥

**चौ०** 
> जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥  
> सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥२॥

भावार्थ: जिसकी अलौकिक सुन्दरता देखकर स्वभावसे ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है। वह सब कारण ( अथवा उसका सब कारण ) तो विधाता जानें। किन्तु हे भाई! सुनो, मेरे मङ्गलदायक ( दाहिने ) अंग फड़क रहे हैं॥ २॥

**चौ०** 
> रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥  
> मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी॥३॥

भावार्थ: रघुवंशियोंका यह सहज ( जन्मगत ) स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्गपर पैर नहीं रखता। मुझे तो अपने मनका अत्यन्त ही विश्वास है कि जिसने [ जाग्रत्‌की कौन कहे ] स्वप्नमें भी परायी स्त्रीपर दृष्टि नहीं डाली है॥३॥

**चौ०** 
> जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी॥  
> मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं॥४॥

भावार्थ: रणमें शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते ( अर्थात्‌ जो लड़ाईके मैदानसे भागते नहीं ), परायी स्त्रियाँ जिनके मन और दृष्टिको नहीं खींच पातीं और भिखारी जिनके यहाँसे ‘नाहीं’ नहीं पाते ( खाली हाथ नहीं लौटते ), ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसारमें थोड़े हैं॥४॥

**दो०** 
> करत बतकही अनुज सन मन सिय रूप लोभान।  
> मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान॥२३१॥

भावार्थ: यों श्रीरामजी छोटे भाईसे बातें कर रहे हैं, पर मन सीताजीके रूपमें लुभाया हुआ उनके मुखरूपी कमलके छबिरूप मकरन्द-रसको भौंरेकी तरह पी रहा है॥२३१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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