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title: "बालकाण्ड दोहा 23"
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# बालकाण्ड · दोहा 23

**चौ०** 
> अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥  
> मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥१॥

भावार्थ: निर्गुण और सगुण—ब्रह्मके दो स्वरूप हैं। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरी सम्मतिमें नाम इन दोनोंसे बड़ा है, जिसने अपने बलसे दोनोंको अपने वशमें कर रखा है॥ १ ॥

**चौ०** 
> प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥  
> एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥२॥  
> उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥  
> ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनँद रासी॥३॥

भावार्थ: सज्जनगण इस बातको मुझ दासकी ढिठाई या केवल काव्योक्ति न समझें। मैं अपने मनके विश्वास, प्रेम और रुचिकी बात कहता हूँ। [ निर्गुण और सगुण ] दोनों प्रकारके ब्रह्मका ज्ञान अग्निके समान है। निर्गुण उस अप्रकट अग्निके समान है जो काठके अंदर है, परन्तु दीखती नहीं; और सगुण उस प्रकट अग्निके समान है जो प्रत्यक्ष दीखती है। [ तत्त्वतः दोनों एक ही हैं; केवल प्रकट-अप्रकटके भेदसे भिन्न मालूम होती हैं। इसी प्रकार निर्गुण और सगुण तत्त्वतः एक ही हैं। इतना होनेपर भी ] दोनों ही जाननेमें बड़े कठिन हैं, परन्तु नामसे दोनों सुगम हो जाते हैं। इसीसे मैंने नामको [ निर्गुण ] ब्रह्मसे और [ सगुण ] रामसे बड़ा कहा है, ब्रह्म व्यापक है, एक है, अविनाशी है; सत्ता, चैतन्य और आनन्दकी घनराशि है॥२-३॥

**चौ०** 
> अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥  
> नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥४॥

भावार्थ: ऐसे विकाररहित प्रभुके हृदयमें रहते भी जगत्‌के सब जीव दीन और दुखी हैं। नामका निरूपण करके ( नामके यथार्थ स्वरूप, महिमा, रहस्य और प्रभावको जानकर )नामका जतन करनेसे ( श्रद्धापूर्वक नामजपरूपी साधन करनेसे ) वही ब्रह्म ऐसे प्रकट हो जाता है जैसे रत्नके जाननेसे उसका मूल्य॥४॥

**दो०** 
> निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।  
> कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार॥२३॥

भावार्थ: इस प्रकार निर्गुणसे नामका प्रभाव अत्यन्त बड़ा है। अब अपने विचारके अनुसार कहता हूँ कि नाम [ सगुण ] रामसे भी बड़ा है॥२३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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