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title: "बालकाण्ड दोहा 226"
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# बालकाण्ड · दोहा 226

पुष्पवाटिका-निरीक्षण, सीताजीका प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजीका परस्पर दर्शन

**चौ०** 
> निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा॥  
> कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी॥१॥

भावार्थ: रात्रिका प्रवेश होते ही ( सन्ध्याके समय ) मुनिने आज्ञा दी, तब सबने सन्ध्यावन्दन किया। फिर प्राचीन कथाएँ तथा इतिहास कहते-कहते सुन्दर रात्रि दो पहर बीत गयी॥१॥

**चौ०** 
> मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई॥  
> जिन्ह के चरन सरोरुह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी॥२॥

भावार्थ: तब श्रेष्ठ मुनिने जाकर शयन किया। दोनों भाई उनके चरण दबाने लगे जिनके चरणकमलोंके [ दर्शन एवं स्पर्शके ] लिये वैराग्यवान्‌ पुरुष भी भाँति-भाँतिके जप और योग करते हैं,॥२॥

**चौ०** 
> तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते। गुर पद कमल पलोटत प्रीते॥  
> बार बार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही॥३॥

भावार्थ: वे ही दोनों भाई मानो प्रेमसे जीते हुए प्रेमपूर्वक गुरुजीके चरणकमलोंको दबा रहे हैं। मुनिने बार-बार आज्ञा दी, तब श्रीरघुनाथजीने जाकर शयन किया॥३॥

**चौ०** 
> चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ॥  
> पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता॥४॥

भावार्थ: श्रीरामजीके चरणोंको हृदयसे लगाकर भय और प्रेमसहित परम सुखका अनुभव करते हुए लक्ष्मणजी उनको दबा रहे हैं। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने बार-बार कहा—हे तात! [ अब ] सो जाओ। तब वे उन चरणकमलोंको हृदयमें धरकर लेट रहे॥४॥

**दो०** 
> उठे लखनु निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान।  
> गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान॥२२६॥

भावार्थ: रात बीतनेपर, मुर्गेका शब्द कानोंसे सुनकर लक्ष्मणजी उठे। जगत्‌के स्वामी सुजान श्रीरामचन्द्रजी भी गुरुसे पहले ही जाग गये॥२२६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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