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title: "बालकाण्ड दोहा 223"
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# बालकाण्ड · दोहा 223

**चौ०** 
> बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबही का॥  
> कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदु गात किसोरा॥१॥

भावार्थ: दूसरीने कहा—हे सखी! तुमने बहुत अच्छा कहा। इस विवाहसे सभीका परम हित है। किसीने कहा—शङ्करजीका धनुष कठोर है और ये साँवले राजकुमार कोमल शरीरके बालक हैं॥१॥

**चौ०** 
> सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी॥  
> सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं॥२॥

भावार्थ: हे सयानी! सब असमंजस ही है। यह सुनकर दूसरी सखी कोमल वाणीसे कहने लगी—हे सखी! इनके सम्बन्धमें कोई-कोई ऐसा कहते हैं कि ये देखनेमें तो छोटे हैं, पर इनका प्रभाव बहुत बड़ा है॥२॥

**चौ०** 
> परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ भूरी॥  
> सो कि रहिहि बिनु सिव धनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें॥३॥

भावार्थ: जिनके चरणकमलोंकी धूलिका स्पर्श पाकर अहल्या तर गयी, जिसने बड़ा भारी पाप किया था, वे क्या शिवजीका धनुष बिना तोड़े रहेंगे। इस विश्वासको भूलकर भी नहीं छोड़ना चाहिये॥३॥

**चौ०** 
> जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी॥  
> तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मृदु बानीं॥४॥

भावार्थ: जिस ब्रह्माने सीताको सँवारकर ( बड़ी चतुराईसे ) रचा है, उसीने विचारकर साँवला वर भी रच रखा है। उसके ये वचन सुनकर सब हर्षित हुईं और कोमल वाणीसे कहने लगीं—ऐसा ही हो॥४॥

**दो०** 
> हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद।  
> जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद॥ २२३॥

भावार्थ: सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रियाँ समूह-की-समूह हृदयमें हर्षित होकर फूल बरसा रही हैं। जहाँ-जहाँ दोनों भाई जाते हैं, वहाँ-वहाँ परम आनन्द छा जाता है॥२२३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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