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title: "बालकाण्ड दोहा 217"
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# बालकाण्ड · दोहा 217

**चौ०** 
> मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्रभाऊ॥  
> सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता॥१॥

भावार्थ: राजाने कहा—हे मुनि! आपके चरणोंके दर्शन कर मैं अपना पुण्य-प्रभाव कह नहीं सकता। ये सुन्दर श्याम और गौर वर्णके दोनों भाई आनन्दको भी आनन्द देनेवाले हैं॥१॥

**चौ०** 
> इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि॥  
> सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू॥२॥

भावार्थ: इनकी आपसकी प्रीति बड़ी पवित्र और सुहावनी है, वह मनको बहुत भाती है, पर [ वाणीसे ] कही नहीं जा सकती। विदेह ( जनकजी ) आनन्दित होकर कहते हैं—हे नाथ! सुनिये, ब्रह्म और जीवकी तरह इनमें स्वाभाविक प्रेम है॥२॥

**चौ०** 
> पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू॥  
> मुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू॥३॥

भावार्थ: राजा बार-बार प्रभुको देखते हैं ( दृष्टि वहाँसे हटना ही नहीं चाहती )। [ प्रेमसे ] शरीर पुलकित हो रहा है और हृदयमें बड़ा उत्साह है। [ फिर ] मुनिकी प्रशंसा करके और उनके चरणोंमें सिर नवाकर राजा उन्हें नगरमें लिवा चले॥३॥

**चौ०** 
> सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला॥  
> करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई॥४॥

भावार्थ: एक सुन्दर महल जो सब समय ( सभी ऋतुओंमें ) सुखदायक था, वहाँ राजाने उन्हें ले जाकर ठहराया। तदनन्तर सब प्रकारसे पूजा और सेवा करके राजा विदा माँगकर अपने घर गये॥४॥

**दो०** 
> रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु।  
> बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु॥२१७॥

भावार्थ: रघुकुलके शिरोमणि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ऋषियोंके साथ भोजन और विश्राम करके भाई लक्ष्मणसमेत बैठे। उस समय पहरभर दिन रह गया था॥२१७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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