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title: "बालकाण्ड दोहा 216"
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# बालकाण्ड · दोहा 216

**चौ०** 
> कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुलपालक॥  
> ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा॥१॥

भावार्थ: हे नाथ! कहिये, ये दोनों सुन्दर बालक मुनिकुलके आभूषण हैं या किसी राजवंशके पालक? अथवा जिसका वेदोंने ‘नेति’ कहकर गान किया है कहीं वह ब्रह्म तो युगलरूप धरकर नहीं आया है?॥१॥

**चौ०** 
> सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥  
> ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ॥२॥

भावार्थ: मेरा मन जो स्वभावसे ही वैराग्यरूप [ बना हुआ ] है, [ इन्हें देखकर ] इस तरह मुग्ध हो रहा है जैसे चन्द्रमाको देखकर चकोर। हे प्रभो! इसलिये मैं आपसे सत्य ( निश्छल ) भावसे पूछता हूँ। हे नाथ! बताइये, छिपाव न कीजिये॥२॥

**चौ०** 
> इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥  
> कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका॥३॥

भावार्थ: इनको देखते ही अत्यन्त प्रेमके वश होकर मेरे मनने जबर्दस्ती ब्रह्मसुखको त्याग दिया है। मुनिने हँसकर कहा—हे राजन्! आपने ठीक ( यथार्थ ही ) कहा। आपका वचन मिथ्या नहीं हो सकता॥३॥

**चौ०** 
> ये प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी॥  
> रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए॥४॥

भावार्थ: जगत्‌में जहाँतक ( जितने भी ) प्राणी हैं, ये सभीको प्रिय हैं। मुनिकी [ रहस्यभरी ] वाणी सुनकर श्रीरामजी मन-ही-मन मुसकराते हैं ( हँसकर मानो संकेत करते हैं कि रहस्य खोलिये नहीं )। [ तब मुनिने कहा— ] ये रघुकुलमणि महाराज दशरथके पुत्र हैं। मेरे हितके लिये राजाने इन्हें मेरे साथ भेजा है॥४॥

**दो०** 
> रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम।  
> मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम॥२१६॥

भावार्थ: ये राम और लक्ष्मण दोनों श्रेष्ठ भाई रूप, शील और बलके धाम हैं। सारा जगत्‌[ इस बातका ] साक्षी है कि इन्होंने युद्धमें असुरोंको जीतकर मेरे यज्ञकी रक्षा की है॥२१६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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