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title: "बालकाण्ड दोहा 212"
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# बालकाण्ड · दोहा 212

**चौ०** 
> चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा॥  
> गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई॥१॥

भावार्थ: श्रीरामजी और लक्ष्मणजी मुनिके साथ चले। वे वहाँ गये, जहाँ जगत्‌को पवित्र करनेवाली गङ्गाजी थीं। महाराज गाधिके पुत्र विश्वामित्रजीने वह सब कथा कह सुनायी जिस प्रकार देवनदी गङ्गाजी पृथ्वीपर आयी थीं॥१॥

**चौ०** 
> तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए॥  
> हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया॥२॥

भावार्थ: तब प्रभुने ऋषियोंसहित [ गङ्गाजीमें ] स्नान किया। ब्राह्मणोंने भाँति-भाँतिके दान पाये। फिर मुनिवृन्दके साथ वे प्रसन्न होकर चले और शीघ्र ही जनकपुरके निकट पहुँच गये॥२॥

**चौ०** 
> पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी॥  
> बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना॥३॥

भावार्थ: श्रीरामजीने जब जनकपुरकी शोभा देखी, तब वे छोटे भाई लक्ष्मणसहित अत्यन्त हर्षित हुए। वहाँ अनेकों बावलियाँ, कुएँ, नदी और तालाब हैं, जिनमें अमृतके समान जल है और मणियोंकी सीढ़ियाँ [ बनी हुई ] हैं॥३॥

**चौ०** 
> गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा॥  
> बरन बरन बिकसे बनजाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता॥४॥

भावार्थ: मकरन्द-रससे मतवाले होकर भौंरे सुन्दर गुंजार कर रहे हैं। रंग-बिरंगे [ बहुत-से ] पक्षी मधुर शब्द कर रहे हैं। रंग-रंगके कमल खिले हैं। सदा ( सब ऋतुओंमें ) सुख देनेवाला शीतल, मन्द, सुगन्ध पवन बह रहा है॥४॥

**दो०** 
> सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास।  
> फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास॥२१२॥

भावार्थ: पुष्पवाटिका ( फुलवारी ), बाग और वन, जिनमें बहुत-से पक्षियोंका निवास है, फूलते, फलते और सुन्दर पत्तोंसे लदे हुए नगरके चारों ओर सुशोभित हैं॥२१२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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