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title: "बालकाण्ड दोहा 210"
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# बालकाण्ड · दोहा 210

अहल्या-उद्धार

**चौ०** 
> प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई॥  
> होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी॥१॥

भावार्थ: सबेरे श्रीरघुनाथजीने मुनिसे कहा—आप जाकर निडर होकर यज्ञ कीजिये। यह सुनकर सब मुनि हवन करने लगे। आप ( श्रीरामजी ) यज्ञकी रखवालीपर रहे॥१॥

**चौ०** 
> सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही॥  
> बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा॥२॥

भावार्थ: यह समाचार सुनकर मुनियोंका शत्रु क्रोधी राक्षस मारीच अपने सहायकोंको लेकर दौड़ा। श्रीरामजीने बिना फलवाला बाण उसको मारा, जिससे वह सौ योजनके विस्तारवाले समुद्रके पार जा गिरा॥२॥

**चौ०** 
> पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा॥  
> मारि असुर द्विज निर्भयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी॥३॥

भावार्थ: फिर सुबाहुको अग्निबाण मारा। इधर छोटे भाई लक्ष्मणजीने राक्षसोंकी सेनाका संहार कर डाला। इस प्रकार श्रीरामजीने राक्षसोंको मारकर ब्राह्मणोंको निर्भय कर दिया। तब सारे देवता और मुनि स्तुति करने लगे॥३॥

**चौ०** 
> तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया॥  
> भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना॥४॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीने वहाँ कुछ दिन और रहकर ब्राह्मणोंपर दया की। भक्तिके कारण ब्राह्मणोंने उन्हें पुराणोंकी बहुत-सी कथाएँ कहीं, यद्यपि प्रभु सब जानते थे॥४॥

**चौ०** 
> तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई॥  
> धनुषजग्य सुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा॥५॥

भावार्थ: तदनन्तर मुनिने आदरपूर्वक समझाकर कहा—हे प्रभो! चलकर एक चरित्र देखिये। रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी धनुषयज्ञ [ की बात ] सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजीके साथ प्रसन्न होकर चले॥५॥

**चौ०** 
> आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं॥  
> पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी॥६॥

भावार्थ: मार्गमें एक आश्रम दिखायी पड़ा। वहाँ पशु-पक्षी, कोई भी जीव-जन्तु नहीं था। पत्थरकी एक शिलाको देखकर प्रभुने पूछा, तब मुनिने विस्तारपूर्वक सब कथा कही॥६॥

**दो०** 
> गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।  
> चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥२१०॥

भावार्थ: गौतम मुनिकी स्त्री अहल्या शापवश पत्थरकी देह धारण किये बड़े धीरजसे आपके चरणकमलोंकी धूलि चाहती है। हे रघुवीर! इसपर कृपा कीजिये॥२१०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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