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title: "बालकाण्ड दोहा 207"
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# बालकाण्ड · दोहा 207

विश्वामित्रका राजा दशरथसे राम-लक्ष्मणको माँगना

**चौ०** 
> मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयउ लै बिप्र समाजा॥  
> करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी॥१॥

भावार्थ: राजाने जब मुनिका आना सुना, तब वे ब्राह्मणोंके समाजको साथ लेकर मिलने गये और दण्डवत्‌ करके मुनिका सम्मान करते हुए उन्हें लाकर अपने आसनपर बैठाया॥१॥

**चौ०** 
> चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा॥  
> बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिबर हृदयँ हरष अति पावा॥२॥

भावार्थ: चरणोंको धोकर बहुत पूजा की और कहा—मेरे समान धन्य आज दूसरा कोई नहीं है। फिर अनेक प्रकारके भोजन करवाये, जिससे श्रेष्ठ मुनिने अपने हृदयमें बहुत ही हर्ष प्राप्त किया॥२॥

**चौ०** 
> पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी॥  
> भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा॥३॥

भावार्थ: फिर राजाने चारों पुत्रोंको मुनिके चरणोंपर डाल दिया ( उनसे प्रणाम कराया )। श्रीरामचन्द्रजीको देखकर मुनि अपनी देहकी सुधि भूल गये। वे श्रीरामजीके मुखकी शोभा देखते ही ऐसे मग्न हो गये, मानो चकोर पूर्ण चन्द्रमाको देखकर लुभा गया हो॥३॥

**चौ०** 
> तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ॥  
> केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा॥४॥

भावार्थ: तब राजाने मनमें हर्षित होकर ये वचन कहे—हे मुनि! इस प्रकार कृपा तो आपने कभी नहीं की। आज किस कारणसे आपका शुभागमन हुआ? कहिये, मैं उसे पूरा करनेमें देर नहीं लगाऊँगा॥४॥

**चौ०** 
> असुर समूह सतावहिं मोही। मैं जाचन आयउँ नृप तोही॥  
> अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा॥५॥

भावार्थ: [ मुनिने कहा— ] हे राजन्! राक्षसोंके समूह मुझे बहुत सताते हैं। इसीलिये मैं तुमसे कुछ माँगने आया हूँ। छोटे भाईसहित श्रीरघुनाथजीको मुझे दो। राक्षसोंके मारे जानेपर मैं सनाथ ( सुरक्षित ) हो जाऊँगा॥५॥

**दो०** 
> देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान।  
> धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान॥२०७॥

भावार्थ: हे राजन्! प्रसन्न मनसे इनको दो, मोह और अज्ञानको छोड़ दो। हे स्वामी! इससे तुमको धर्म और सुयशकी प्राप्ति होगी और इनका परम कल्याण होगा॥२०७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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