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title: "बालकाण्ड दोहा 206"
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# बालकाण्ड · दोहा 206

**चौ०** 
> यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई॥  
> बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी॥१॥

भावार्थ: यह सब चरित्र मैंने गाकर ( बखानकर ) कहा। अब आगेकी कथा मन लगाकर सुनो। ज्ञानी महामुनि विश्वामित्रजी वनमें शुभ आश्रम ( पवित्र स्थान ) जानकर बसते थे,॥१॥

**चौ०** 
> जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं॥  
> देखत जग्य निसाचर धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं॥२॥

भावार्थ: जहाँ वे मुनि जप, यज्ञ और योग करते थे, परन्तु मारीच और सुबाहुसे बहुत डरते थे। यज्ञ देखते ही राक्षस दौड़ पड़ते थे और उपद्रव मचाते थे, जिससे मुनि [ बहुत ] दुःख पाते थे॥२॥

**चौ०** 
> गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी॥  
> तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा॥३॥

भावार्थ: गाधिके पुत्र विश्वामित्रजीके मनमें चिन्ता छा गयी कि ये पापी राक्षस भगवान्‌के [ मारे ] बिना न मरेंगे। तब श्रेष्ठ मुनिने मनमें विचार किया कि प्रभुने पृथ्वीका भार हरनेके लिये अवतार लिया है॥३॥

**चौ०** 
> एहूँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौं दोउ भाई॥  
> ग्यान बिराग सकल गुन अयना। सो प्रभु मैं देखब भरि नयना॥४॥

भावार्थ: इसी बहाने जाकर मैं उनके चरणोंका दर्शन करूँ और विनती करके दोनों भाइयोंको ले आऊँ। [ अहा! ] जो ज्ञान, वैराग्य और सब गुणोंके धाम हैं, उन प्रभुको मैं नेत्र भरकर देखूँगा॥४॥

**दो०** 
> बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार।  
> करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार॥२०६॥

भावार्थ: बहुत प्रकारसे मनोरथ करते हुए जानेमें देर नहीं लगी। सरयूजीके जलमें स्नान करके वे राजाके दरवाजेपर पहुँचे॥२०६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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