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title: "बालकाण्ड दोहा 205"
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# बालकाण्ड · दोहा 205

**चौ०** 
> बंधु सखा सँग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई॥  
> पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी॥१॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजी भाइयों और इष्ट-मित्रोंको बुलाकर साथ ले लेते हैं और नित्य वनमें जाकर शिकार खेलते हैं। मनमें पवित्र समझकर मृगोंको मारते हैं और प्रतिदिन लाकर राजा ( दशरथजी ) को दिखलाते हैं॥१॥

**चौ०** 
> जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे॥  
> अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं॥२॥

भावार्थ: जो मृग श्रीरामजीके बाणसे मारे जाते थे, वे शरीर छोड़कर देवलोकको चले जाते थे। श्रीरामचन्द्रजी अपने छोटे भाइयों और सखाओंके साथ भोजन करते हैं और माता-पिताकी आज्ञाका पालन करते हैं॥२॥

**चौ०** 
> जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा॥  
> बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई॥३॥

भावार्थ: जिस प्रकार नगरके लोग सुखी हों, कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी वही संयोग ( लीला ) करते हैं। वे मन लगाकर वेद-पुराण सुनते हैं और फिर स्वयं छोटे भाइयोंको समझाकर कहते हैं॥३॥

**चौ०** 
> प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥  
> आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥४॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरुको मस्तक नवाते हैं और आज्ञा लेकर नगरका काम करते हैं। उनके चरित्र देख-देखकर राजा मनमें बड़े हर्षित होते हैं॥४॥

**दो०** 
> ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।  
> भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप॥२०५॥

भावार्थ: जो व्यापक, अकल ( निरवयव ), इच्छारहित, अजन्मा और निर्गुण हैं; तथा जिनका न नाम है न रूप, वही भगवान्‌ भक्तोंके लिये नाना प्रकारके अनुपम ( अलौकिक ) चरित्र करते हैं॥२०५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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